श्रीलंका में साल 2019 में हुए भयावह ईस्टर आत्मघाती हमले के मामले में अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोलंबो हाईकोर्ट ने मामले में 24 आरोपियों में से 15 को दोषी करार देते हुए प्रत्येक को 220 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। वहीं, अदालत ने 9 अन्य आरोपियों को बरी कर दिया। इस मामले में करीब पांच साल तक सुनवाई चली, जिसके दौरान हजारों आरोपों और बड़ी संख्या में गवाहों के बयान दर्ज किए गए।
15 आरोपियों को सुनाई गई सजा
तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद 15 आरोपियों को विभिन्न गंभीर अपराधों का दोषी पाया। अदालत ने प्रत्येक दोषी को 220-220 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई। यह मामला श्रीलंका के सबसे बड़े आतंकी हमलों में शामिल रहा है और इसके फैसले पर लंबे समय से नजर बनी हुई थी।
मामले में कुल 24 लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाया गया था। इनमें से 15 को दोषी ठहराया गया, जबकि 9 आरोपियों को पर्याप्त आधार नहीं मिलने पर अदालत ने बरी कर दिया।
23 हजार से ज्यादा आरोप, 2 हजार से अधिक गवाह
इस मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से बड़ी संख्या में सबूत पेश किए गए। आरोपियों के खिलाफ कुल 23 हजार 270 आरोप तय किए गए थे। वहीं, 2 हजार 309 गवाहों के बयान अदालत के सामने दर्ज हुए। लंबे समय तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद अब अदालत ने अपना फैसला सुनाया है।
आरोपियों पर आतंकवाद रोकथाम कानून के तहत कई गंभीर धाराओं में मुकदमा चलाया गया। इनमें हत्या, हत्या का प्रयास, आतंकवादी गतिविधियों की साजिश, हथियार और विस्फोटक रखने तथा उनका इस्तेमाल करने जैसे आरोप शामिल थे।
छह ठिकानों पर हुआ था सिलसिलेवार हमला
21 अप्रैल 2019 को ईस्टर संडे के मौके पर श्रीलंका में सिलसिलेवार आत्मघाती धमाके हुए थे। हमलावरों ने तीन चर्च और तीन प्रमुख होटलों को निशाना बनाया था। इन हमलों में 270 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें 11 भारतीय नागरिक भी शामिल थे। इसके अलावा 500 से ज्यादा लोग घायल हुए थे।
जांच के दौरान सामने आया था कि हमलों में स्थानीय इस्लामी चरमपंथी संगठन नेशनल तौहीद जमात से जुड़े आत्मघाती हमलावर शामिल थे। संगठन के नेता जाहरान हाशिम ने हमलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस हमले के बाद श्रीलंका की सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया तंत्र को लेकर भी गंभीर सवाल उठे थे।
हमले के बाद उठे थे कई सवाल
ईस्टर हमलों के बाद श्रीलंका में राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी विवाद पैदा हुआ था। आरोप लगाया गया था कि हमले से पहले संभावित खतरे से जुड़ी खुफिया सूचनाएं मौजूद थीं, लेकिन समय रहते पर्याप्त कार्रवाई नहीं हो सकी। तत्कालीन सरकार के शीर्ष अधिकारियों की भूमिका और सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय को लेकर भी सवाल उठे थे।
अब करीब पांच साल की सुनवाई के बाद अदालत के इस फैसले से मामले में दोषी ठहराए गए आरोपियों को सजा मिल गई है। वहीं, 9 आरोपियों के बरी होने के बाद मामले में अदालत के सामने पेश किए गए सबूतों और आरोपों के आधार पर अलग-अलग निष्कर्ष सामने आए हैं।

