रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध के बीच अमेरिका ने रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया है। अमेरिकी संसद के निचले सदन से रूस और ईरान पर नए प्रतिबंधों से जुड़ा विधेयक पारित हो चुका है। अब यह विधेयक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास पहुंच गया है। व्हाइट हाउस के एक अधिकारी के मुताबिक, ट्रंप इस विधेयक पर हस्ताक्षर करने की योजना बना रहे हैं। अगर राष्ट्रपति इस पर हस्ताक्षर करते हैं, तो रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का रास्ता साफ हो सकता है।
किन देशों पर पड़ सकता है असर?
प्रस्तावित कानून के तहत रूस से ऊर्जा उत्पाद खरीदने वाले देशों पर अमेरिकी प्रशासन अतिरिक्त टैरिफ लगा सकता है। चर्चा में भारत, चीन और तुर्की समेत करीब दस देशों के नाम सामने आए हैं। हालांकि, विधेयक पर हस्ताक्षर होने के बाद भी यह जरूरी नहीं है कि सभी देशों पर एक साथ या तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लागू कर दिया जाए। टैरिफ लगाने और उसकी दर तय करने का फैसला आगे अमेरिकी प्रशासन की कार्रवाई पर निर्भर करेगा।
यह प्रावधान रूस के साथ व्यापारिक संबंध रखने वाले देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के उद्देश्य से लाया गया है। अमेरिका की कोशिश रूस की ऊर्जा बिक्री से होने वाली आय को प्रभावित करने की बताई जा रही है, क्योंकि तेल और गैस रूस की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण राजस्व स्रोत हैं।
ट्रंप के हस्ताक्षर के बाद क्या होगा?
अमेरिकी संसद से विधेयक पारित होने के बाद अब राष्ट्रपति की मंजूरी अगला महत्वपूर्ण चरण है। ट्रंप अगर इस पर हस्ताक्षर करते हैं, तो उन्हें रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों के खिलाफ प्रस्तावित टैरिफ व्यवस्था का इस्तेमाल करने का अधिकार मिल सकता है।
इसके बाद अमेरिकी प्रशासन यह तय कर सकता है कि किन देशों पर कार्रवाई की जाए, किस तरह के उत्पादों को इसके दायरे में रखा जाए और टैरिफ की दर कितनी हो। 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाए जाने की संभावना को लेकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी असर पड़ सकता है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है मामला?
इस घटनाक्रम में भारत का नाम भी सामने आया है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न देशों से कच्चा तेल खरीदता है। ऐसे में रूस से होने वाले ऊर्जा आयात पर अमेरिकी कार्रवाई की संभावना भारत के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक और व्यापारिक मुद्दा बन सकती है।
भारत की ओर से कहा गया है कि वह अपने करीब 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। इसका मतलब है कि देश के लिए ऊर्जा की पर्याप्त उपलब्धता, कीमत और आपूर्ति की स्थिरता महत्वपूर्ण प्राथमिकताएं हैं।
अमेरिका रूस पर क्यों बढ़ा रहा दबाव?
अमेरिकी सांसदों की ओर से इस विधेयक को रूस की आर्थिक और सैन्य क्षमता पर दबाव बढ़ाने के उपाय के तौर पर पेश किया गया है। अमेरिकी पक्ष का तर्क है कि रूस की तेल से होने वाली आय कम होने पर उसकी युद्ध क्षमता पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।
कुछ अमेरिकी सांसदों ने यह भी कहा है कि जो देश रूस के साथ कारोबार जारी रखते हैं और अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन नहीं करते, उन्हें अमेरिकी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। उनका दावा है कि आर्थिक दबाव के जरिए रूस को यूक्रेन युद्ध को लेकर बातचीत की दिशा में आगे बढ़ने के लिए मजबूर किया जा सकता है।
फिलहाल पूरी नजर राष्ट्रपति ट्रंप के हस्ताक्षर और उसके बाद अमेरिकी प्रशासन की अगली कार्रवाई पर है। यदि प्रस्तावित टैरिफ व्यवस्था लागू होती है, तो इसका असर रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों और वैश्विक ऊर्जा बाजार दोनों पर पड़ सकता है।

