BRICS में 11 देश, लेकिन प्राथमिकताएं अलग-अलग
नई दिल्ली में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन के बीच दुनिया की नजर एक बार फिर इस समूह की बढ़ती ताकत पर है। कभी चार देशों से शुरू हुआ यह मंच अब 11 देशों का समूह बन चुका है। इसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और इंडोनेशिया शामिल हैं।
आबादी और अर्थव्यवस्था के लिहाज से BRICS का आकार काफी बड़ा है। समूह के सदस्य देशों में दुनिया की करीब आधी आबादी रहती है और वैश्विक GDP में भी इनकी हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत के आसपास बताई जाती है। यही वजह है कि इसे बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण मंच माना जा रहा है। हालांकि, सवाल यह है कि क्या अलग-अलग रणनीतिक और आर्थिक हित रखने वाले ये देश वास्तव में एकजुट वैश्विक शक्ति बन सकते हैं?
चीन की अलग रणनीति, भारत की अलग सोच
BRICS के भीतर सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल चीन इस मंच का इस्तेमाल वैश्विक स्तर पर अपने रणनीतिक और आर्थिक प्रभाव को बढ़ाने के लिए करना चाहता है। चीन BRICS को पश्चिमी नेतृत्व वाली मौजूदा वैश्विक व्यवस्था के विकल्प के तौर पर मजबूत करने की कोशिश करता रहा है।
वहीं भारत का दृष्टिकोण इससे कुछ अलग है। भारत BRICS को किसी देश या समूह के खिलाफ गठबंधन के रूप में नहीं देखता, बल्कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, विकासशील देशों की आवाज और वैश्विक संस्थाओं में सुधार के लिए एक महत्वपूर्ण मंच मानता है।
रूस और ईरान के लिए आर्थिक विकल्प अहम
रूस के लिए BRICS का महत्व पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच नए व्यापारिक और आर्थिक साझेदार तलाशने से भी जुड़ा है। मॉस्को इस मंच के जरिए यह संदेश देना चाहता है कि उसके पास वैश्विक स्तर पर सहयोग के दूसरे विकल्प मौजूद हैं।
ईरान की प्राथमिकताएं भी कुछ हद तक इसी दिशा में हैं। वह पश्चिमी प्रतिबंधों के प्रभाव को कम करने और गैर-पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करने के लिए BRICS को उपयोगी मंच मानता है।
खाड़ी देशों के हित हैं अलग
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात BRICS के महत्वपूर्ण सदस्य हैं, लेकिन उनके पश्चिमी देशों के साथ पुराने रणनीतिक और आर्थिक संबंध भी हैं। ऐसे में दोनों देश BRICS के जरिए अपने आर्थिक और कूटनीतिक विकल्प बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन पश्चिम से संबंध खत्म करना उनकी प्राथमिकता नहीं है।
ऊर्जा क्षेत्र में प्रभाव रखने वाले इन देशों के बीच क्षेत्रीय हितों को लेकर भी मतभेद रहे हैं। इसके बावजूद वे BRICS में आर्थिक सहयोग की संभावनाएं तलाश रहे हैं।
अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों की अपनी जरूरतें
ब्राजील ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने पर जोर देता है। दक्षिण अफ्रीका के लिए अफ्रीकी हित, निवेश और विकास महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।
मिस्र को विदेशी निवेश और आर्थिक विकास की जरूरत है, जबकि इथियोपिया के लिए बुनियादी ढांचे का विकास और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करना अहम है।
क्या सच में बन सकता है नया ग्लोबल पावर?
BRICS की ताकत उसकी विशाल आबादी, अर्थव्यवस्था, ऊर्जा संसाधनों और अलग-अलग क्षेत्रों में मौजूद प्रभाव में है। लेकिन सदस्य देशों की विदेश नीति और रणनीतिक प्राथमिकताएं हमेशा एक जैसी नहीं हैं।
यही वजह है कि BRICS को फिलहाल एक पूर्ण राजनीतिक या सैन्य गठबंधन के बजाय आर्थिक और कूटनीतिक सहयोग के बढ़ते मंच के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा। अगर सदस्य देश अपने मतभेदों के बावजूद व्यापार, स्थानीय मुद्राओं, तकनीक, विकास और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर ठोस सहयोग बढ़ाते हैं, तो आने वाले वर्षों में यह वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।

