शेयर बाजार में कारोबार करने वाले निवेशकों के लिए आने वाले समय में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड यानी SEBI कथित तौर पर शॉर्ट सेलिंग और सिक्योरिटीज लेंडिंग एंड बॉरोइंग व्यवस्था को आसान बनाने पर विचार कर रहा है। इसके तहत शेयर उधार लेने और देने के लिए योग्य कंपनियों की संख्या लगभग दोगुनी की जा सकती है। इसके अलावा निवेशकों से मांगी जाने वाली कोलेटरल यानी गारंटी राशि में भी कमी करने पर चर्चा चल रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर करीब 2,600 कंपनियां सूचीबद्ध हैं, लेकिन वर्तमान में केवल 176 शेयर ही सिक्योरिटीज लेंडिंग एंड बॉरोइंग व्यवस्था के लिए पात्र हैं। प्रस्तावित बदलावों के बाद अधिक लिक्विड शेयरों को इस सुविधा के दायरे में लाया जा सकता है। हालांकि, SEBI ने अभी इन संभावित बदलावों की आधिकारिक घोषणा नहीं की है। मामले से परिचित सूत्रों का कहना है कि नए नियमों का विवरण वर्ष 2026 के अंत तक तय किया जा सकता है।
क्या होती है शॉर्ट सेलिंग?
शॉर्ट सेलिंग ऐसी ट्रेडिंग रणनीति है, जिसमें निवेशक किसी शेयर को पहले उधार लेकर बाजार में बेचता है। अगर बाद में शेयर की कीमत गिरती है, तो वह उसे कम दाम पर खरीदकर वापस कर देता है। बेचने और दोबारा खरीदने की कीमत के बीच का अंतर निवेशक का मुनाफा होता है।
हालांकि, शेयर की कीमत गिरने के बजाय बढ़ने पर निवेशक को बड़ा नुकसान भी हो सकता है। इसलिए शॉर्ट सेलिंग को जोखिम रहित निवेश विकल्प नहीं माना जाता। शेयर उधार लेने की सुविधा उपलब्ध कराने वाली SLB व्यवस्था में लेन-देन एक्सचेंज के माध्यम से किया जाता है, जिससे शॉर्ट सेलर समय पर शेयरों की डिलीवरी कर सकता है।
कोलेटरल की शर्तों में मिल सकती है राहत
भारत में शेयर उधार लेने के दौरान निवेशकों को कुछ मामलों में शेयरों के मूल्य का लगभग 130 प्रतिशत तक कोलेटरल देना पड़ता है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिका और यूरोप में यह स्तर करीब 100 प्रतिशत रहता है। SEBI इस अंतर को कम करने के लिए भारतीय बाजार की कोलेटरल आवश्यकताओं में राहत देने पर विचार कर रहा है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि कोलेटरल की सीमा कितनी कम की जाएगी।
वर्तमान व्यवस्था में किसी शेयर को SLB के लिए योग्य बनाने में उसकी लिक्विडिटी, ट्रेडिंग वॉल्यूम, सार्वजनिक शेयरधारिता और डेरिवेटिव एक्सपोजर संभालने की क्षमता जैसे मानकों को देखा जाता है। प्रस्तावित समीक्षा के दौरान इनमें से कुछ शर्तों को आसान किया जा सकता है।
कैश मार्केट में कारोबार बढ़ाना चाहता है नियामक
संभावित बदलावों का उद्देश्य कैश इक्विटी बाजार में लिक्विडिटी और निवेशकों की भागीदारी बढ़ाना बताया जा रहा है। भारत का डेरिवेटिव्स बाजार तेजी से बढ़ा है, लेकिन इसमें छोटे निवेशकों के नुकसान को लेकर SEBI लगातार चिंता व्यक्त करता रहा है।
SEBI के सितंबर 2024 में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, वित्त वर्ष 2021-22 से 2023-24 के बीच इक्विटी फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस में कारोबार करने वाले 93 प्रतिशत व्यक्तिगत ट्रेडर्स को नुकसान हुआ था। तीन वर्षों में इन निवेशकों का कुल नुकसान 1.8 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहा।
नियामक का मानना है कि मजबूत SLB व्यवस्था से कैश मार्केट में बेहतर प्राइस डिस्कवरी और लिक्विडिटी मिल सकती है। निवेशकों को ध्यान रखना चाहिए कि फिलहाल ये बदलाव विचार-विमर्श के स्तर पर हैं। अंतिम नियम, पात्र शेयरों की सूची और कोलेटरल से जुड़ी राहत SEBI की आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगी।

