नई दिल्ली/बेंगलुरु: कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर सत्ता परिवर्तन और मंत्रिमंडल फेरबदल को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। कांग्रेस हाईकमान ने मुख्यमंत्री Siddaramaiah और उपमुख्यमंत्री D. K. Shivakumar को दिल्ली बुलाया है। इस बैठक को राज्य की राजनीति के लिए बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि लंबे समय से मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रही अटकलों के बीच अब पार्टी नेतृत्व कोई बड़ा फैसला ले सकता है।
कांग्रेस सरकार के गठन के समय से ही मुख्यमंत्री पद को लेकर सत्ता साझेदारी की चर्चाएं होती रही हैं। पिछले कई महीनों से डीके शिवकुमार समर्थक यह दावा करते रहे हैं कि पार्टी नेतृत्व ने उन्हें ढाई साल बाद मुख्यमंत्री बनाने का आश्वासन दिया था। ऐसे में दिल्ली में होने वाली बैठक को लेकर राजनीतिक गलियारों में उत्सुकता बढ़ गई है।
सूत्रों के अनुसार, पिछले छह महीनों से डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री पद को लेकर कांग्रेस नेतृत्व से सकारात्मक संकेत मिलने का इंतजार कर रहे हैं। दूसरी ओर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया हाल ही में अपने कार्यकाल के तीन वर्ष पूरे कर चुके हैं और उन्होंने आगामी 2028 विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए मंत्रिमंडल में बड़े स्तर पर बदलाव की आवश्यकता जताई है। उनका मानना है कि चुनाव से पहले संगठन और सरकार दोनों को मजबूत करने के लिए नए चेहरों को अवसर देना जरूरी है।
दिल्ली में केवल मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री ही नहीं पहुंचे हैं, बल्कि राज्य सरकार के कई मंत्री भी राजधानी में डेरा डाले हुए हैं। इसके अलावा 45 से अधिक विधायक और 10 से ज्यादा विधान परिषद सदस्य भी दिल्ली पहुंचे हैं। इनमें कई ऐसे विधायक शामिल हैं जो लंबे समय से मंत्री पद की मांग कर रहे हैं और हाईकमान पर दबाव बनाए हुए हैं।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि कांग्रेस नेतृत्व के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। एक ओर सिद्धारमैया राज्य के सबसे लोकप्रिय ओबीसी नेताओं में गिने जाते हैं और उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने 2023 विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल की थी। दूसरी ओर डीके शिवकुमार को संगठन को मजबूत करने और चुनावी जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का श्रेय दिया जाता है। ऐसे में किसी भी निर्णय का सीधा असर पार्टी की एकता और भविष्य की रणनीति पर पड़ सकता है।
मुख्यमंत्री खेमे से जुड़े नेताओं का मानना है कि सिद्धारमैया अपना कार्यकाल जारी रखेंगे और केवल मंत्रिमंडल में बड़ा फेरबदल किया जाएगा। उनका तर्क है कि सरकार के अंतिम वर्षों में नेतृत्व परिवर्तन से प्रशासनिक और राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो सकती है। वहीं शिवकुमार समर्थकों को भरोसा है कि कांग्रेस हाईकमान सत्ता साझेदारी के कथित वादे को पूरा करेगा और उन्हें शेष दो वर्षों के लिए मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी।
फिलहाल कांग्रेस नेतृत्व की ओर से कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है। हालांकि दिल्ली में होने वाली बैठकों के बाद स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है। चाहे फैसला मंत्रिमंडल विस्तार का हो या नेतृत्व परिवर्तन का, इसका असर केवल कर्नाटक की राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति पर भी पड़ेगा।
अब सभी की नजरें नई दिल्ली में होने वाली अहम बैठकों पर टिकी हैं, जहां कर्नाटक के राजनीतिक भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय लिए जा सकते हैं।

