22 May 2026, Fri

CBSE की क्लास 9वीं और 10वीं के लिए 3 भाषाओं के अनिवार्य नियम को SC में चुनौती, जानें याचिकाकर्ता की आपत्ति

 

Supreme Court of India में Central Board of Secondary Education यानी CBSE की नई 3-भाषा नीति को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर अगले हफ्ते सुनवाई होगी। यह मामला कक्षा 9वीं और 10वीं के छात्रों के लिए भाषाओं को अनिवार्य किए जाने से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नई व्यवस्था छात्रों पर अतिरिक्त बोझ डालेगी और इससे शिक्षा व्यवस्था में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।

दरअसल, CBSE ने हाल ही में कक्षा 9वीं के छात्रों के लिए तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य करने की नीति लागू की है। इस फैसले के खिलाफ दाखिल याचिका में कहा गया है कि अचानक अतिरिक्त भाषाएं लागू करना लाखों छात्रों के लिए मुश्किल पैदा करेगा, खासकर उन छात्रों के लिए जो पहले से निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार पढ़ाई कर रहे हैं।

शुक्रवार को वरिष्ठ वकील Mukul Rohatgi ने सुप्रीम कोर्ट के सामने इस मामले का उल्लेख किया। उन्होंने अदालत से जल्द सुनवाई की मांग करते हुए कहा कि छात्र अचानक नई भाषाएं कैसे सीखेंगे और फिर उसी आधार पर 10वीं की परीक्षा कैसे देंगे। रोहतगी ने कहा कि इससे देशभर में “अराजकता” की स्थिति बन सकती है।

सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने कहा कि मामले को अगले सप्ताह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा। अदालत ने फिलहाल मामले पर कोई अंतरिम टिप्पणी नहीं की, लेकिन यह संकेत जरूर दिया कि छात्रों और अभिभावकों की चिंताओं को गंभीरता से सुना जाएगा।

याचिका में दावा किया गया है कि नई भाषा नीति को लागू करने से पहले पर्याप्त तैयारी और परामर्श नहीं किया गया। कई स्कूलों में अतिरिक्त भाषा के शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं, जबकि छात्रों के पास नई भाषा सीखने के लिए पर्याप्त समय भी नहीं है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे छात्रों पर मानसिक दबाव बढ़ सकता है और परीक्षा परिणाम भी प्रभावित हो सकते हैं।

वकील मुकुल रोहतगी ने कोर्ट को बताया कि यह याचिका सिर्फ कुछ छात्रों की नहीं, बल्कि देशभर के विद्यार्थियों, शिक्षकों और अभिभावकों की चिंताओं को सामने लाने के लिए दाखिल की गई है। उनका कहना था कि शिक्षा नीति में बड़े बदलाव अचानक लागू नहीं किए जाने चाहिए, क्योंकि इसका सीधा असर छात्रों के भविष्य पर पड़ता है।

नई शिक्षा नीति के तहत बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है, लेकिन इस फैसले को लेकर कई राज्यों और शिक्षा विशेषज्ञों के बीच अलग-अलग राय सामने आई है। कुछ विशेषज्ञ इसे छात्रों के लिए फायदेमंद बता रहे हैं, जबकि कई लोग इसे व्यावहारिक रूप से कठिन मान रहे हैं।

अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी है। माना जा रहा है कि अदालत इस मामले में छात्रों के हित, शिक्षा व्यवस्था और नई नीति के व्यावहारिक प्रभावों को ध्यान में रखते हुए अहम टिप्पणी कर सकती है।

इस मामले का फैसला आने वाले समय में देशभर के लाखों CBSE छात्रों और स्कूलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

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