सुप्रीम कोर्ट ने यूपी आबकारी नीति पर दायर PIL निस्तारित की, टेट्रा पैक शराब बिक्री पर उठे सवाल
नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश की आबकारी नीति को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, जिसमें अदालत ने याचिका को निस्तारित कर दिया। याचिका में आरोप लगाया गया था कि राज्य की नीति के तहत टेट्रा पैक में शराब की बिक्री की अनुमति दी जा रही है, जिससे बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, कोर्ट ने इस मुद्दे पर तत्काल हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए मामले को संबंधित प्राधिकरण के पास भेजने की सलाह दी।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि टेट्रा पैक में शराब की बिक्री बच्चों के लिए भ्रम की स्थिति पैदा कर सकती है। उनका कहना था कि इस तरह की पैकेजिंग आम पेय पदार्थों जैसी दिखती है, जिससे बच्चे इसे लेकर स्कूल या सार्वजनिक स्थानों पर जा सकते हैं। यह स्थिति समाज के लिए चिंताजनक हो सकती है और इसके दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं।
इस पर सुनवाई कर रहे मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति शराब खरीदना चाहता है, तो वह किसी भी रूप में खरीद सकता है। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या किसी शहर या क्षेत्र में इस तरह की पैकेजिंग के कारण स्कूलों या शैक्षणिक संस्थानों में कोई वास्तविक समस्या या घटना सामने आई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल आशंकाओं के आधार पर नीति में हस्तक्षेप करना उचित नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि उसके सामने ऐसा कोई स्पष्ट रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया है, जिसमें यह दर्शाया गया हो कि उत्तर प्रदेश की आबकारी नीति में टेट्रा पैक में शराब की बिक्री को औपचारिक रूप से मंजूरी दी गई है। हालांकि, कोर्ट ने यह जरूर माना कि 4 फरवरी को किसी प्रशासनिक निर्णय के तहत छोटे पैक में शराब बिक्री की अनुमति दी गई हो सकती है, लेकिन संबंधित नीति दस्तावेज अदालत के समक्ष पेश नहीं किए गए।
अदालत ने याचिका को निस्तारित करते हुए याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी कि वह अपनी शिकायत और संबंधित दस्तावेज राज्य के सक्षम प्राधिकरण के समक्ष प्रतिनिधित्व के रूप में प्रस्तुत कर सकता है। इसके बाद संबंधित विभाग इस मुद्दे की जांच कर उचित निर्णय ले सकता है।
इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि सुप्रीम कोर्ट फिलहाल इस मामले में सीधे हस्तक्षेप नहीं करेगा, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर ही इस पर विचार किया जाएगा। वहीं, इस मुद्दे ने एक बार फिर शराब की पैकेजिंग और उसकी उपलब्धता को लेकर सामाजिक और नैतिक बहस को जन्म दे दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते समय में नीतियों को इस तरह तैयार किया जाना चाहिए, जिससे समाज के संवेदनशील वर्गों, खासकर बच्चों पर कोई गलत असर न पड़े। अब देखना होगा कि संबंधित प्राधिकरण इस मामले में क्या कदम उठाता है और क्या भविष्य में इस तरह की पैकेजिंग पर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं।

