भारत और रूस के बीच ऊर्जा सहयोग एक बार फिर मजबूत होता नजर आ रहा है। हालिया घटनाक्रमों के अनुसार, Narendra Modi और Vladimir Putin के नेतृत्व वाले दोनों देशों ने लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) और कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर नए सिरे से सहमति बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ रही है और भारत अपने ऊर्जा स्रोतों को सुरक्षित करने की रणनीति पर काम कर रहा है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत और रूस के बीच LNG की सीधी आपूर्ति दोबारा शुरू करने को लेकर “मौखिक सहमति” बन चुकी है। यह समझौता 19 मार्च को नई दिल्ली में हुई बैठक के दौरान सामने आया, जिसमें रूसी उप ऊर्जा मंत्री पावेल सोरोकिन और भारत के पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी शामिल थे। अगर यह समझौता अंतिम रूप लेता है, तो यूक्रेन युद्ध के बाद पहली बार रूस सीधे भारत को LNG सप्लाई करेगा।
इसके साथ ही रूस से कच्चे तेल के आयात को भी बढ़ाने की योजना पर चर्चा हुई है। अनुमान है कि आने वाले समय में भारत द्वारा रूस से तेल आयात दोगुना होकर कुल आयात का लगभग 40% तक पहुंच सकता है। इससे भारत को सस्ते दामों पर ऊर्जा उपलब्ध होगी, वहीं रूस को भी अपनी अर्थव्यवस्था को सहारा देने में मदद मिलेगी।
दरअसल, कुछ महीने पहले भारत ने रूस से तेल खरीद में कटौती की थी। यह फैसला उस समय लिया गया था जब Donald Trump के नेतृत्व में अमेरिका ने भारतीय निर्यात पर टैरिफ बढ़ाने का दबाव बनाया था। इसे एक कूटनीतिक समझौते के रूप में देखा गया था। हालांकि, मौजूदा हालात में भारत ने फिर से अपने आर्थिक हितों को प्राथमिकता देते हुए रूस के साथ ऊर्जा संबंधों को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव ने भी इस फैसले को प्रभावित किया है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी संघर्ष के चलते वैश्विक ऊर्जा सप्लाई चेन पर असर पड़ा है। खासकर Strait of Hormuz में बढ़ते तनाव के कारण भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर खतरा मंडराने लगा है, क्योंकि देश का बड़ा हिस्सा तेल और LNG इसी मार्ग से आता है।
इस संकट का असर भारत में भी देखने को मिला, जहां ईंधन की कीमतों में तेजी, गैस सप्लाई में कमी और पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें जैसी समस्याएं सामने आईं। ऐसे में रूस के साथ सीधी ऊर्जा आपूर्ति भारत के लिए एक रणनीतिक विकल्प बनकर उभर रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मध्य-पूर्व में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो इसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। महंगाई बढ़ने, रुपये में गिरावट और निर्यात में कमी जैसी चुनौतियां सामने आ सकती हैं।
कुल मिलाकर, भारत और रूस के बीच ऊर्जा सहयोग का यह नया दौर न केवल दोनों देशों के संबंधों को मजबूत करेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत को स्थिरता प्रदान करने में भी अहम भूमिका निभा सकता है।

