Russia Offers Mediation Amid Iran–US Tensions, Kremlin Signals Readiness for Peace Efforts
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच रूस ने एक बार फिर कूटनीतिक भूमिका निभाने की इच्छा जताई है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने कहा है कि रूस ऐसे किसी भी मध्यस्थता प्रयास या “अच्छे कार्यालय” की सुविधा देने के लिए तैयार है, जो दोनों पक्षों—ईरान और अमेरिका—के लिए स्वीकार्य हो।
पेसकोव ने कहा, “हम सब कुछ करने को तैयार हैं, ताकि अंततः स्थायी शांति स्थापित हो और युद्ध की ओर वापसी न हो।” रूस का यह बयान ऐसे समय आया है जब खाड़ी क्षेत्र में हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति बहाली के प्रयास तेज हो रहे हैं।
पहले दौर की वार्ता रही थी असफल
ईरान और अमेरिका के बीच 11–12 अप्रैल को शांति वार्ता का पहला दौर हुआ था, लेकिन यह बातचीत किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकी। इसके बाद से दोनों देशों के बीच तनाव में कोई बड़ी कमी नहीं आई है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार दोनों पक्षों से बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील कर रहा है।
कूटनीतिक दौरे तेज, कई देशों में हुई चर्चा
ईरानी प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख अराघची हाल ही में रूस पहुंचने से पहले पाकिस्तान के इस्लामाबाद की यात्रा कर चुके हैं। इस दौरान उन्होंने पाकिस्तानी आर्मी चीफ फील्ड मार्शल आसिम मुनीर से मुलाकात की और क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की।
इसके अलावा उन्होंने ओमान का भी दौरा किया, जहां उन्होंने सुल्तान हैथम बिन तारिक से मुलाकात की। इस बैठक में होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा और ईरान-अमेरिका तनाव को कम करने के कूटनीतिक प्रयासों पर बातचीत हुई।
युद्ध की पृष्ठभूमि और हालात
रिपोर्ट्स के अनुसार, इस संघर्ष की शुरुआत 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए संयुक्त हमले से मानी जा रही है। इस हमले में ईरान के कई शीर्ष सैन्य अधिकारियों और कथित तौर पर पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत की खबर सामने आई थी। इसके बाद ईरान की जवाबी कार्रवाई ने हालात को और बिगाड़ दिया और संघर्ष पूरे खाड़ी क्षेत्र में फैल गया।
बढ़ता तनाव और शांति की उम्मीद
मौजूदा स्थिति में अंतरराष्ट्रीय समुदाय शांति की दिशा में किसी मजबूत पहल की उम्मीद कर रहा है। रूस की मध्यस्थता की पेशकश को एक अहम कूटनीतिक कदम माना जा रहा है, जिससे बातचीत की प्रक्रिया को फिर से गति मिल सकती है। हालांकि, अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिका और ईरान इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या क्षेत्र में स्थायी शांति की दिशा में कोई ठोस प्रगति हो पाती है।

