नई दिल्ली में 16 अप्रैल से शुरू हो रहे संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण को लेकर सियासी हलचल तेज होने जा रही है। सरकार इस सत्र में महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण देने से जुड़े संवैधानिक संशोधन पर विस्तृत चर्चा कराना चाहती है। हालांकि, इस मुद्दे पर विपक्ष ने पहले ही मोर्चा खोल दिया है और आने वाले तीन दिनों में संसद में जोरदार बहस और हंगामे के आसार हैं।
सरकार का उद्देश्य है कि यह आरक्षण व्यवस्था 2029 के लोकसभा चुनाव से लागू हो जाए। गौरतलब है कि यह कानून 2023 में ही पारित हो चुका है, लेकिन इसके लागू होने की प्रक्रिया को लेकर अब भी कई सवाल और राजनीतिक मतभेद बने हुए हैं। इसी को स्पष्ट करने के लिए विशेष सत्र बुलाया गया है।
सीटों में बढ़ोतरी का प्रस्ताव
सरकारी सूत्रों के अनुसार, प्रस्तावित व्यवस्था के तहत लोकसभा सीटों में लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की जा सकती है। मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर करीब 850 तक ले जाने की संभावना जताई जा रही है। सरकार का कहना है कि यह बढ़ोतरी पूरी तरह “प्रोपोर्शनल” होगी, यानी हर राज्य को उसकी जनसंख्या के आधार पर सीटें मिलेंगी और किसी के साथ अन्याय नहीं होगा।
हालांकि, इस प्रस्ताव ने विपक्षी दलों की चिंता बढ़ा दी है। खासकर दक्षिण भारत के राज्यों को आशंका है कि सीटों के पुनर्निर्धारण (डिलिमिटेशन) से उनकी हिस्सेदारी कम हो सकती है।
विपक्ष का तीखा विरोध
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार महिला आरक्षण के नाम पर डिलिमिटेशन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहती है, जिससे उसे राजनीतिक फायदा मिल सकता है। मल्लिकार्जुन खरगे के नेतृत्व में विपक्षी गठबंधन इस मुद्दे पर रणनीति तैयार कर रहा है।
कांग्रेस का कहना है कि वह महिला आरक्षण का समर्थन करती है, लेकिन इसे मौजूदा सीटों के भीतर ही लागू किया जाना चाहिए। पार्टी का तर्क है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उनके साथ सीटों की कटौती के जरिए अन्याय नहीं होना चाहिए।
दक्षिण भारत के नेताओं ने भी इस मुद्दे पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। एम.के. स्टालिन ने चेतावनी दी है कि अगर राज्यों के हितों की अनदेखी हुई तो जनता सड़कों पर उतर सकती है। वहीं रेवंत रेड्डी ने भी सरकार को संभावित विरोध का संकेत दिया है।
सरकार का पक्ष
सरकार ने विपक्ष की चिंताओं को खारिज करते हुए कहा है कि अभी सीटों की सटीक संख्या तय नहीं की गई है। यह फैसला भविष्य में गठित डिलिमिटेशन आयोग करेगा। सरकार का दावा है कि सभी राज्यों के हितों को ध्यान में रखते हुए निष्पक्ष तरीके से सीटों का बंटवारा किया जाएगा।
साथ ही, सरकार ने भरोसा दिलाया है कि दक्षिणी राज्यों की आशंकाओं का समाधान किया जाएगा और किसी भी क्षेत्र के साथ भेदभाव नहीं होगा।
आगे क्या?
संसद के इस विशेष सत्र में 16 से 18 अप्रैल तक इस मुद्दे पर चर्चा होगी और दोनों सदनों में वोटिंग भी कराई जा सकती है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार और विपक्ष के बीच किसी सहमति का रास्ता निकलता है या फिर यह मुद्दा और बड़ा राजनीतिक विवाद बन जाता है।
निष्कर्ष
महिला आरक्षण का मुद्दा जहां एक ओर सामाजिक न्याय और राजनीतिक भागीदारी से जुड़ा है, वहीं दूसरी ओर यह देश की संघीय संरचना और क्षेत्रीय संतुलन से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। ऐसे में संसद का यह विशेष सत्र न सिर्फ राजनीतिक रूप से अहम है, बल्कि देश की भविष्य की राजनीति की दिशा भी तय कर सकता है।

