कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सार्वजनिक लाइब्रेरी से पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की कई चर्चित किताबों को हटाने का फैसला किया गया है। इनमें उनकी मशहूर कविता ‘एपांग ओपांग झपांग’ भी शामिल है। सरकार के इस कदम के बाद राज्य की राजनीति में एक नई बहस छिड़ गई है।
सूत्रों के मुताबिक, नई प्रशासनिक व्यवस्था के तहत यह निर्णय लिया गया है कि लाइब्रेरी में केवल उन्हीं पुस्तकों को रखा जाएगा जिनका शैक्षिक या चरित्र-निर्माण से जुड़ा स्पष्ट महत्व हो। अधिकारियों का कहना है कि रवींद्रनाथ टैगोर और स्वामी विवेकानंद जैसे महान साहित्यकारों की रचनाओं को प्राथमिकता दी जाएगी, जबकि अन्य “गैर-जरूरी” पुस्तकों को सूची से बाहर किया जा रहा है।
90 किताबों की अनिवार्य खरीद नीति खत्म
जानकारी के अनुसार, पहले जारी एक आदेश के तहत स्कूलों और लाइब्रेरी को ममता बनर्जी द्वारा लिखी लगभग 90 किताबें खरीदना अनिवार्य किया गया था। लेकिन अब इस नीति को समाप्त कर दिया गया है। प्रशासन का कहना है कि लाइब्रेरी चयन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और शैक्षिक मानकों पर आधारित बनाया जा रहा है।
मंत्री का बयान भी सामने आया
लाइब्रेरी विभाग के मंत्री गौरी शंकर घोष ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पिछली सरकार के दौरान कई निर्णय राजनीतिक प्रभाव में लिए गए थे। उनके अनुसार, अब प्राथमिकता केवल गुणवत्तापूर्ण और उपयोगी साहित्य को दी जाएगी। उन्होंने कहा कि इसी कारण से लाइब्रेरी से “गैर-आवश्यक” पुस्तकों को हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई है।
राजनीतिक विवाद की संभावना
हालांकि इस कदम को लेकर राजनीतिक विवाद भी बढ़ने की आशंका है। विपक्ष का कहना है कि यह निर्णय साहित्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा मामला बन सकता है, जबकि सरकार इसे प्रशासनिक सुधार का हिस्सा बता रही है।
फिलहाल, राज्य भर की लाइब्रेरी में पुस्तकों की समीक्षा और छंटाई की प्रक्रिया जारी है।

