प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर के एक करोड़ से अधिक लोक सेवकों को एक विशेष पत्र लिखकर शासन व्यवस्था में “नागरिक देवो भव” की भावना को सर्वोपरि रखने का आह्वान किया है। अपने संदेश में पीएम मोदी ने कहा कि सरकार और प्रशासन का हर निर्णय जनता की सेवा और उनके हित को केंद्र में रखकर लिया जाना चाहिए। उन्होंने लोक सेवकों को “कर्मयोगी” कहकर संबोधित किया और उनसे अपेक्षा जताई कि वे अपने काम में करुणा, संवेदनशीलता और निरंतर सीखने की प्रवृत्ति को अपनाएं।
पीएम मोदी ने अपने पत्र में इस बात पर जोर दिया कि 21वीं सदी भारत के लिए अवसरों और चुनौतियों दोनों से भरी हुई है। तेजी से बदलती टेक्नोलॉजी, नवाचार और वैश्विक अपेक्षाओं के बीच प्रशासनिक तंत्र को भी उतना ही चुस्त और आधुनिक होना चाहिए। उन्होंने कहा कि नागरिकों की अपेक्षाएं लगातार बढ़ रही हैं और ऐसे में सरकारी तंत्र को और अधिक प्रभावी, पारदर्शी और उत्तरदायी बनाना जरूरी है।
यह पत्र 20 अप्रैल को सिविल सेवा दिवस से एक दिन पहले जारी किया गया था और इसे 12 भारतीय भाषाओं—हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, ओडिया, गुजराती, बांग्ला, कन्नड़, पंजाबी, असमिया, मलयालम, तेलुगु और तमिल—में प्रकाशित किया गया। इससे सरकार का उद्देश्य देश के हर कोने तक संदेश पहुंचाना रहा।
प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में यह भी कहा कि लोक सेवकों को “आईगॉट कर्मयोगी” जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए, ताकि वे निरंतर सीखते रहें और अपनी क्षमताओं को और बेहतर बना सकें। उन्होंने इसे एक “आजीवन सीखने की यात्रा” बताया और कहा कि एक बेहतर प्रशासन ही एक बेहतर भारत का निर्माण कर सकता है।
पीएम मोदी ने अपने पत्र में त्योहारों के समय का भी उल्लेख किया और कहा कि देश के अलग-अलग हिस्सों में रोंगाली बिहू, बैसाखी, विशु, पुथंडू और पोइला बोइशाख जैसे पर्व नई ऊर्जा और नए आरंभ का प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे सकारात्मक माहौल में “साधना सप्ताह” जैसी पहलें लोक सेवकों को आत्ममंथन और सुधार का अवसर देती हैं।
अपने संदेश के अंत में प्रधानमंत्री ने लोक सेवकों को प्रेरित करते हुए कहा कि उनका हर छोटा कदम देश की प्रगति में बड़ा योगदान देता है। उन्होंने जोर दिया कि प्रशासन का मूल उद्देश्य केवल शासन करना नहीं, बल्कि सेवा करना होना चाहिए और “नागरिक देवो भव” की भावना को हर निर्णय का आधार बनाना चाहिए।

