17 Apr 2026, Fri

चेरनोबिल परमाणु केंद्र पर रूसी हमले के बाद पर मंडराया रेडिएशन का खतरा, 40 साल पहले यहीं हुई थी भीषण आपदा

यूक्रेन के चेरनोबिल परमाणु ऊर्जा संयंत्र को लेकर एक बार फिर गंभीर चिंता सामने आई है। दुनिया की सबसे भयावह परमाणु आपदा के करीब 40 साल बाद अब अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संगठन ग्रीनपीस ने रेडिएशन के बड़े खतरे की चेतावनी जारी की है। यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण इस क्षेत्र की सुरक्षा पहले से ही खतरे में है।

ग्रीनपीस की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, चेरनोबिल संयंत्र के अंदर मौजूद पुराना ‘सरकोफैगस’ (स्टील और कंक्रीट से बना ढांचा) तेजी से कमजोर हो रहा है। यह वही ढांचा है जिसे 1986 की दुर्घटना के बाद जल्दबाजी में बनाया गया था, ताकि रेडियोएक्टिव पदार्थों को बाहर फैलने से रोका जा सके। अब आशंका जताई जा रही है कि यह आंतरिक संरचना कभी भी ढह सकती है, जिससे भारी मात्रा में रेडियोएक्टिव धूल वातावरण में फैल सकती है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस ढांचे के अंदर लगभग चार टन अत्यधिक खतरनाक रेडियोएक्टिव पदार्थ मौजूद हैं, जिनमें ईंधन के अवशेष और विषैले कण शामिल हैं। अगर यह संरचना ढहती है, तो इसका असर सिर्फ यूक्रेन ही नहीं बल्कि पूरे यूरोप पर पड़ सकता है। रेडिएशन की यह लहर सीमाओं को पार कर व्यापक पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संकट पैदा कर सकती है।

चेरनोबिल संयंत्र को फिलहाल दो परतों से सुरक्षित किया गया है। पहली परत पुरानी सरकोफैगस है, जबकि दूसरी आधुनिक संरचना ‘न्यू सेफ कन्फाइनमेंट’ (NSC) है। हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि यह आधुनिक ढांचा भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं रह गया है। 2022 में युद्ध शुरू होने के बाद से रूसी हमलों ने इस क्षेत्र की सुरक्षा को और कमजोर कर दिया है। पिछले साल हुए एक हमले में इस बाहरी ढांचे को भी नुकसान पहुंचा था।

ग्रीनपीस के परमाणु विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते आंतरिक संरचना को मजबूत या हटाया नहीं गया, तो अनियंत्रित ढहने की स्थिति पैदा हो सकती है। लेकिन युद्ध के चलते इस तरह के तकनीकी और मरम्मत कार्य करना बेहद मुश्किल हो गया है। लगातार हमलों और अस्थिर हालात के कारण विशेषज्ञों की पहुंच भी सीमित हो गई है।

चेरनोबिल संयंत्र के अधिकारियों ने भी इस खतरे को गंभीर बताया है। उनका कहना है कि यदि किसी मिसाइल या रॉकेट का हमला सीधे संरचना पर नहीं भी होता, तो आसपास गिरने वाला विस्फोट भी भूकंप जैसा प्रभाव पैदा कर सकता है, जिससे कमजोर ढांचा ढह सकता है।

गौरतलब है कि 26 अप्रैल 1986 को चेरनोबिल में हुए विस्फोट ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था। इस हादसे में तत्काल 31 लोगों की मौत हुई थी, जबकि बाद के वर्षों में हजारों लोग रेडिएशन से जुड़ी बीमारियों का शिकार हुए। लाखों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े थे और इसका असर आज भी देखा जा सकता है।

वर्तमान हालात को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि चेरनोबिल सिर्फ एक पुरानी त्रासदी नहीं, बल्कि आज भी एक संभावित वैश्विक खतरा बना हुआ है। यदि स्थिति पर जल्द नियंत्रण नहीं पाया गया, तो यह एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े संकट का कारण बन सकता है।

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