शिमला। आर्थिक संकट से जूझ रहे हिमाचल प्रदेश में करीब 27 साल बाद सरकारी लॉटरी की वापसी की तैयारी शुरू हो गई है। राज्य सरकार ने लॉटरी संचालन के लिए Sole Selling Agent नियुक्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए वित्त विभाग के कोष, लेखा एवं लॉटरी निदेशालय की ओर से ई-टेंडर जारी किया गया है। हालांकि, फिलहाल राज्य में लॉटरी शुरू नहीं हुई है। पहले टेंडर प्रक्रिया पूरी होगी और इसके बाद चयनित एजेंसी को जिम्मेदारी सौंपी जाएगी।
सरकार की इस पहल का उद्देश्य प्रदेश के राजस्व में बढ़ोतरी करना है। वहीं, पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता अनुराग ठाकुर ने सरकारी लॉटरी शुरू करने के फैसले का विरोध किया है। उन्होंने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से वित्त विभाग की ओर से जारी टेंडर को तुरंत वापस लेने की मांग की है।
दिवाली के आसपास हो सकता है पहला बड़ा ड्रॉ
सरकार की योजना के मुताबिक अगर टेंडर प्रक्रिया तय समय के अनुसार पूरी हो जाती है और सभी जरूरी औपचारिकताएं समय पर पूरी हो जाती हैं, तो दिवाली के आसपास लॉटरी का पहला बड़ा ड्रॉ आयोजित किया जा सकता है। सरकार पेपर टिकट के साथ-साथ ऑनलाइन लॉटरी की बिक्री की भी तैयारी कर रही है।
इसका मतलब है कि लोग अधिकृत बिक्री केंद्रों से टिकट खरीदने के अलावा डिजिटल माध्यम से भी लॉटरी में हिस्सा ले सकेंगे। हालांकि, लॉटरी का वास्तविक संचालन चयनित एजेंसी की नियुक्ति और अन्य जरूरी मंजूरियों के बाद ही शुरू होगा।
21 अगस्त को जारी हुआ ई-टेंडर
कोष, लेखा एवं लॉटरी निदेशालय ने 21 अगस्त 2026 को Sole Selling Agent की नियुक्ति के लिए ई-टेंडर जारी किया है। टेंडर प्रक्रिया के तहत ऑनलाइन बोली जमा करने की शुरुआत 3 सितंबर से होगी, जबकि आवेदन जमा करने की अंतिम तारीख 14 सितंबर निर्धारित की गई है। तकनीकी बोली 15 सितंबर को खोली जाएगी।
वित्तीय बोली खोलने की तारीख बाद में तय की जाएगी। टेंडर में प्रावधान है कि वित्तीय बोली खुलने के 30 दिनों के भीतर चयनित एजेंसी को अवार्ड लेटर जारी किया जाएगा। इसके बाद आवश्यक औपचारिकताएं पूरी होने पर लॉटरी का संचालन शुरू किया जा सकेगा।
सरकार को हर साल 50 करोड़ रुपये राजस्व की उम्मीद
हिमाचल सरकार आर्थिक दबाव के बीच अतिरिक्त राजस्व जुटाने के लिए नए स्रोत तलाश रही है। सरकार को उम्मीद है कि सरकारी लॉटरी से प्रदेश को करीब 50 करोड़ रुपये सालाना अतिरिक्त राजस्व मिल सकता है। राज्य पर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज होने के बीच सरकार के लिए राजस्व बढ़ाना बड़ी चुनौती बनी हुई है।
सरकार ने लॉटरी से होने वाली कमाई के मामले में पंजाब और केरल जैसे राज्यों का उदाहरण भी दिया है। इसी आधार पर हिमाचल में भी लॉटरी को राजस्व जुटाने के एक माध्यम के तौर पर देखा जा रहा है।
एजेंट को देनी होगी 10 करोड़ की सालाना लाइसेंस फीस
टेंडर के अनुसार चयनित Sole Selling Agent को सरकार को हर साल 10 करोड़ रुपये लाइसेंस फीस के तौर पर देने होंगे। इस फीस में प्रत्येक वर्ष 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी का प्रावधान रखा गया है। इसके अलावा एजेंसी को कम से कम 6 करोड़ रुपये सालाना Minimum Guaranteed Amount भी देना होगा।
लॉटरी के कुल कारोबार पर कम से कम 2 प्रतिशत की राशि से जुड़ी शर्तें भी टेंडर में शामिल हैं। ऐसे में सरकार को उम्मीद है कि लॉटरी संचालन से प्रदेश के खजाने को अतिरिक्त आय हासिल होगी।
अनुराग ठाकुर ने किया विरोध
सरकार की इस योजना पर अनुराग ठाकुर ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से मांग की है कि सरकारी लॉटरी के लिए जारी टेंडर को तत्काल वापस लिया जाए। उनका कहना है कि सरकार को राजस्व जुटाने के लिए ऐसे विकल्पों पर निर्भर रहने के बजाय अन्य ठोस आर्थिक उपायों पर ध्यान देना चाहिए।
अब नजर इस बात पर है कि टेंडर प्रक्रिया तय समय पर पूरी होती है या नहीं और क्या हिमाचल प्रदेश में करीब 27 साल बाद दिवाली के आसपास सरकारी लॉटरी का पहला बड़ा ड्रॉ आयोजित हो पाता है।

