22 May 2026, Fri

₹5 करोड़ की बेची जमीन, लेट भरा ITR; फिर भी नहीं देना पड़ा एक रुपये भी टैक्स! शख्स ने ऐसे जीती कानूनी लड़ाई

 

Income Tax Appellate Tribunal (ITAT) मुंबई के एक हालिया फैसले ने टैक्सपेयर्स के बीच नई चर्चा छेड़ दी है। इस मामले में मुंबई के एक व्यक्ति ने 5 करोड़ रुपये से अधिक की जमीन बेचकर करोड़ों का मुनाफा कमाया, लेकिन फिर भी उसे एक रुपये का टैक्स नहीं देना पड़ा। खास बात यह रही कि व्यक्ति ने समय पर आयकर रिटर्न (ITR) भी दाखिल नहीं किया था, इसके बावजूद ट्रिब्यूनल ने फैसला उसके पक्ष में सुनाया।

मामला मुंबई के विले पार्ले निवासी बाबूलाल से जुड़ा है। उन्होंने वर्ष 2017 में अपनी तीन जमीनें करीब 5.03 करोड़ रुपये में बेची थीं। इस सौदे से उन्हें लगभग 3.68 करोड़ रुपये का लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) हुआ। भारतीय आयकर कानून के तहत, यदि कोई व्यक्ति जमीन या संपत्ति बेचकर मिले मुनाफे को नई रिहायशी संपत्ति खरीदने में निवेश करता है, तो उसे धारा 54 के तहत टैक्स छूट मिल सकती है।

नियमों के अनुसार, यदि टैक्सपेयर्स तय समय सीमा के भीतर नई संपत्ति नहीं खरीद पाते, तो उन्हें पूंजीगत लाभ खाते योजना यानी Capital Gains Account Scheme (CGAS) में रकम जमा करनी होती है। बाबूलाल ने समय पर ITR दाखिल नहीं किया और बढ़ाई गई समय सीमा के बाद 28 दिसंबर 2018 को रिटर्न भरा। हालांकि, उन्होंने इससे चार दिन पहले ही नई संपत्ति खरीदने के लिए 8.45 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया था।

आयकर विभाग ने इस आधार पर टैक्स छूट देने से इनकार कर दिया कि बाबूलाल ने CGAS खाते में रकम जमा नहीं की थी। विभाग का कहना था कि नियमों का पालन न होने के कारण उन्हें धारा 54 का लाभ नहीं मिल सकता। मामला बाद में ITAT मुंबई पहुंचा।

ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में कहा कि यदि टैक्सपेयर्स ने बेलटेड ITR दाखिल करने से पहले ही पूरा पूंजीगत लाभ नई संपत्ति खरीदने में निवेश कर दिया हो, तो CGAS खाते में पैसा जमा करना अनिवार्य नहीं माना जा सकता। ITAT ने स्पष्ट किया कि जब पूरा LTCG पहले ही इस्तेमाल हो चुका था, तब कोई “अनयूज्ड अमाउंट” बचा ही नहीं था, इसलिए केवल तकनीकी आधार पर टैक्स छूट रोकी नहीं जा सकती।

हालांकि, ट्रिब्यूनल ने निर्धारण अधिकारी को नई संपत्ति खरीद से जुड़े दस्तावेजों की जांच करने का निर्देश भी दिया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि निवेश वास्तव में नियमों के अनुरूप किया गया था।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन टैक्सपेयर्स के लिए राहतभरा हो सकता है, जो किसी कारणवश समय पर ITR दाखिल नहीं कर पाते लेकिन बाद में पूंजीगत लाभ को नई संपत्ति में निवेश कर देते हैं। हालांकि टैक्स सलाहकारों का कहना है कि हर मामला अलग होता है और किसी भी निवेश या टैक्स योजना से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है।

यह फैसला यह भी दिखाता है कि अदालतें केवल तकनीकी त्रुटियों की बजाय लेनदेन के वास्तविक उद्देश्य और तथ्यों को भी महत्व देती हैं। आने वाले समय में यह निर्णय कई समान मामलों में मिसाल बन सकता है।

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