22 Jul 2026, Wed

सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया स्टैंडर्ड चार्टर्ड के खिलाफ 23 साल पुराना मामला, 3 दशक पुराने ट्रांजैक्शन से जुड़ा था केस

देश की सर्वोच्च अदालत ने ब्रिटिश बहुराष्ट्रीय बैंक स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक को बड़ी राहत देते हुए उसके खिलाफ चल रहे 23 साल पुराने आपराधिक मामले को रद्द कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इतने लंबे समय तक मामला लंबित रहने और शिकायत के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्य नहीं होने के कारण इस मुकदमे को आगे जारी रखना न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने इस दौरान बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसमें मामले को समाप्त करने से इनकार किया गया था।

यह फैसला जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने सुनाया। अदालत ने अपने अंतर्निहित अधिकारों का उपयोग करते हुए कहा कि यह मामला करीब तीन दशक पुराने वित्तीय लेन-देन से जुड़ा है, लेकिन 23 वर्षों के दौरान भी इसकी सुनवाई समन जारी होने के शुरुआती चरण से आगे नहीं बढ़ सकी। ऐसे में मुकदमे को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि शिकायत का आधार विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (FERA), 1973 के तहत कथित तौर पर जारी किए गए एक “स्पष्टीकरण नोटिस” पर था। हालांकि शिकायतकर्ता आज तक न तो इस नोटिस का कोई विश्वसनीय रिकॉर्ड प्रस्तुत कर पाया और न ही यह स्पष्ट कर सका कि यह नोटिस कब जारी किया गया था। अदालत ने कहा कि जब किसी आपराधिक शिकायत की बुनियाद ही प्रमाणित नहीं हो सके, तो ऐसे मामले को आगे बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं रह जाता।

पीठ ने यह भी कहा कि इतने लंबे समय तक मुकदमे को लंबित रखना बैंक और उसके अधिकारियों को अनिश्चितकाल तक कानूनी असमंजस में रखने जैसा है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल मुकदमे चलाना नहीं, बल्कि समयबद्ध और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करना भी है। यदि जांच एजेंसियां आवश्यक दस्तावेज और साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पातीं, तो आरोपी पक्ष को वर्षों तक मुकदमे का बोझ उठाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 397 और धारा 482 से जुड़े कानूनी पहलुओं पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि धारा 397 के तहत वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध होने का अर्थ यह नहीं है कि हाई कोर्ट धारा 482 के अंतर्गत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग नहीं कर सकता। दोनों धाराओं का उद्देश्य और दायरा अलग-अलग है तथा परिस्थितियों के अनुसार उनका इस्तेमाल किया जा सकता है।

अदालत ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि मामले में लंबे समय तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई और जांच में गंभीर लापरवाही बरती गई। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि FERA की धारा 61(2) के तहत “स्पष्टीकरण नोटिस” जारी करना एक अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया है। यदि यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तो न तो वैध शिकायत दर्ज की जा सकती है और न ही मजिस्ट्रेट उस पर संज्ञान ले सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक के लिए बड़ी राहत है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि बिना पर्याप्त साक्ष्यों और अनिवार्य कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किए किसी भी आपराधिक मामले को वर्षों तक लंबित नहीं रखा जा सकता। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है, जहां जांच में देरी और प्रक्रियागत खामियों के कारण न्याय प्रभावित होता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *