वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि संसद में 2003 के दौरान प्रस्तावित संशोधन को कानून में शामिल नहीं किया गया था। दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के अनुसार, सरकार की हिस्सेदारी घटाने या बेचने पर कानूनी रोक नहीं है।
भारत सरकार के वित्त मंत्रालय ने IDBI बैंक में सरकार की हिस्सेदारी कम करने और रणनीतिक विनिवेश से जुड़े कानूनी पहलुओं पर स्पष्टीकरण जारी किया है। मंत्रालय ने बताया कि वर्ष 2003 में संसद में हुई चर्चाओं के दौरान सरकार की हिस्सेदारी को कम होने से रोकने के उद्देश्य से एक संशोधन प्रस्तावित किया गया था। हालांकि, यह संशोधन अंततः स्वीकार नहीं हुआ और संसद से पारित कानून का हिस्सा नहीं बना।
मंत्रालय का यह स्पष्टीकरण ऐसे समय आया है, जब IDBI बैंक में सरकारी हिस्सेदारी और संभावित विनिवेश को लेकर कानूनी प्रावधानों की व्याख्या पर चर्चा हो रही है। सरकार ने अपने रुख को स्पष्ट करते हुए पुराने विधायी घटनाक्रम और न्यायालय के फैसले का उल्लेख किया है।
2003 में क्या हुआ था?
वित्त मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2003 के केंद्रीय बजट पर चर्चा और IDBI (निरसन) अधिनियम, 2003 पर संसदीय बहस के दौरान सरकार की हिस्सेदारी को कम होने से रोकने के लिए एक संशोधन पेश करने का प्रस्ताव सामने आया था। लेकिन संसद ने इसे अंतिम कानून में शामिल नहीं किया।
मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि संसद में किसी प्रस्ताव पर हुई चर्चा या सदस्यों की ओर से दिए गए बयान अपने आप में कानून का स्थान नहीं ले सकते। किसी भी कानूनी प्रावधान की व्याख्या संसद द्वारा पारित अंतिम कानून के आधार पर ही की जानी चाहिए।
दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले में क्या कहा गया?
इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने ‘ऑल इंडिया IDBI ऑफिसर्स एसोसिएशन बनाम भारत संघ एवं अन्य’ शीर्षक वाले मामले में 17 दिसंबर 2018 को फैसला सुनाया था। अदालत ने संबंधित रिट याचिका खारिज कर दी थी।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि संसद में लगभग 15 वर्ष पहले हुई बहस के दौरान दिए गए बयानों के आधार पर केंद्र सरकार को IDBI लिमिटेड में अपनी हिस्सेदारी कम करने से नहीं रोका जा सकता। न्यायालय के अनुसार, जिस संशोधन को प्रस्तावित किया गया था, वह संसद से पारित कानून में शामिल नहीं था। इसलिए संसदीय बहस के बयानों को कानून के स्पष्ट प्रावधानों के ऊपर नहीं रखा जा सकता।
फैसले में यह भी कहा गया कि IDBI (निरसन) अधिनियम, 2003 की भाषा में ऐसी कोई अस्पष्टता नहीं है, जिसके आधार पर सरकार को अपनी हिस्सेदारी कम करने या बेचने से रोका जा सके।
प्रॉमिसरी एस्टॉपेल के सिद्धांत पर भी स्थिति स्पष्ट
वित्त मंत्रालय ने अपने स्पष्टीकरण में ‘प्रॉमिसरी एस्टॉपेल’ के कानूनी सिद्धांत का भी उल्लेख किया। सामान्य रूप से यह सिद्धांत कुछ परिस्थितियों में किसी पक्ष को अपने पहले के आश्वासन से पीछे हटने से रोक सकता है, यदि दूसरे पक्ष ने उस आश्वासन पर भरोसा करके कदम उठाया हो।
मंत्रालय के अनुसार, इस सिद्धांत का इस्तेमाल सरकार को IDBI लिमिटेड में अपनी हिस्सेदारी घटाने या बेचने से रोकने के लिए नहीं किया जा सकता।
रणनीतिक विनिवेश पर सरकार का रुख
मंत्रालय ने यह भी कहा कि IDBI बैंक में बदलाव और रणनीतिक विनिवेश को लेकर सरकार की नीति विभिन्न केंद्रीय बजट भाषणों में दोहराई जाती रही है। इस स्पष्टीकरण का मुख्य उद्देश्य 2003 के विधायी घटनाक्रम, संबंधित कानून और न्यायालय के फैसले के आधार पर सरकार की हिस्सेदारी से जुड़े कानूनी पक्ष को स्पष्ट करना है।
कुल मिलाकर, वित्त मंत्रालय का कहना है कि वर्ष 2003 में प्रस्तावित लेकिन कानून में शामिल न किए गए संशोधन के आधार पर सरकार को IDBI बैंक में अपनी हिस्सेदारी कम करने या बेचने से रोकने का आधार नहीं बनता।

