गुजरात के बनासकांठा जिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे के दौरान एक दिलचस्प नजारा देखने को मिला। भीलड़ी स्थित भारत बोवाइन ब्रीडिंग एंड रिसर्च सेंटर में छात्रों के साथ बातचीत के दौरान मोदी के समर्थन में नारे सुनाई दिए। इस अवसर पर बड़ी संख्या में पशुपालक महिलाएं भी स्वागत के लिए पहुंचीं। उनके हाथों में ऐसे बैनर थे, जिन पर लिखा था कि मोदी कहीं नहीं जाएंगे, जब तक भारत दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में शामिल नहीं हो जाता।
इस स्वागत और समर्थन के पीछे बनासकांठा में पिछले कुछ दशकों के दौरान हुए कृषि और पशुपालन संबंधी बदलावों को एक अहम वजह माना जा रहा है। कभी प्राकृतिक आपदाओं और पानी की कमी से जूझने वाले इस जिले में डेयरी सहकारिता, आधुनिक सिंचाई और कृषि संबंधी पहलों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने में भूमिका निभाई है।
बनास डेयरी ने पशुपालकों को दिया सहारा
बनासकांठा की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बनास डेयरी का महत्वपूर्ण स्थान है। डेयरी सहकारी व्यवस्था के माध्यम से बड़ी संख्या में पशुपालक दूध उत्पादन और उसकी बिक्री से जुड़े हैं। इस व्यवस्था ने ग्रामीण परिवारों को नियमित आय का एक जरिया उपलब्ध कराया है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, बनास डेयरी से जुड़े पशुपालकों की मासिक आय का कुल आंकड़ा पहले के वर्षों में लगभग 22.88 करोड़ रुपये बताया गया था। बाद के वर्षों में इसमें उल्लेखनीय वृद्धि हुई। आंकड़ों में गुजरात में नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री रहने के दौरान यह राशि बढ़कर करीब 288 करोड़ रुपये प्रति माह और प्रधानमंत्री बनने के बाद के वर्षों में लगभग 1,400 करोड़ रुपये प्रति माह तक पहुंचने का दावा किया गया है।
हालांकि, इन आंकड़ों को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि कुल भुगतान और प्रत्येक पशुपालक की व्यक्तिगत आय अलग-अलग बातें हैं। वास्तविक लाभ पशुओं की संख्या, दूध उत्पादन, लागत और परिवार की भागीदारी जैसे कारकों पर भी निर्भर करता है।
ज्योतिग्राम योजना और कृषि महोत्सव की भूमिका
गुजरात में ग्रामीण विकास और कृषि को बढ़ावा देने के लिए ज्योतिग्राम योजना तथा कृषि महोत्सव जैसी पहलों को महत्वपूर्ण माना गया। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली की उपलब्धता बेहतर करना, किसानों तक कृषि संबंधी जानकारी पहुंचाना और खेती के आधुनिक तरीकों को प्रोत्साहित करना था।
बनासकांठा जैसे कम वर्षा वाले क्षेत्र में सिंचाई के बेहतर विकल्पों का विशेष महत्व है। पानी की सीमित उपलब्धता के कारण किसानों के लिए ऐसी तकनीकों को अपनाना जरूरी रहा है, जिनसे कम पानी में फसलों की जरूरत पूरी की जा सके।
ड्रिप इरिगेशन से खेती को मिला नया विकल्प
जिले में ड्रिप इरिगेशन और स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों के इस्तेमाल को बढ़ावा मिला है। ड्रिप इरिगेशन में पानी बूंद-बूंद करके पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है। इससे पानी की बर्बादी कम करने और सिंचाई को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिल सकती है।
आधुनिक सिंचाई पद्धतियों के इस्तेमाल से किसानों को पारंपरिक फसलों के साथ-साथ कुछ नए फल उगाने के अवसर भी मिले हैं। बनासकांठा में अनार और ड्रैगन फ्रूट जैसी फसलों की खेती इसका उदाहरण है। हालांकि, ऐसी फसलों की सफलता मिट्टी, तापमान, बाजार की मांग और उचित कृषि प्रबंधन पर निर्भर करती है।
सहकारिता और ग्रामीण विकास का मॉडल
बनासकांठा की विकास यात्रा में डेयरी सहकारिता, कृषि तकनीक और सरकारी योजनाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। सहकारी संस्थाओं के माध्यम से किसानों और पशुपालकों तक जानकारी तथा सुविधाएं पहुंचाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
प्रधानमंत्री के दौरे के दौरान मिला स्वागत इसी ग्रामीण बदलाव और सहकारी व्यवस्था के प्रति लोगों के जुड़ाव को दर्शाता है। हालांकि, जिले के विकास का आकलन करने के लिए आय, रोजगार, पानी की उपलब्धता और किसानों की आर्थिक स्थिति जैसे विभिन्न पहलुओं को साथ देखकर निष्कर्ष निकालना जरूरी है।

