10 Jun 2026, Wed

पाकिस्तान में कब्रिस्तान के लिए कम पड़ रही जमीन! लोगों का दर्द सुन भर आएंगी आंखें

पेशावर में अल्पसंख्यकों की गंभीर समस्या: कब्रिस्तान की कमी से जूझते समुदाय

पाकिस्तान के पेशावर शहर में अल्पसंख्यक समुदाय, खासकर ईसाई, कब्रिस्तान की जमीन की भारी कमी का सामना कर रहे हैं। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई जगहों पर पुरानी कब्रों को दोबारा खोदकर नई लाशों को दफनाया जा रहा है। इससे न केवल लोगों की भावनाएं आहत हो रही हैं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक विवाद भी बढ़ रहे हैं।

‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ की रिपोर्ट के मुताबिक, कब्रिस्तानों में जगह की कमी के कारण अंतिम संस्कार एक बड़ी चुनौती बन गया है। कॉलेज लेक्चरर इमरान यूसुफ मसीह ने बताया कि कई परिवारों को मजबूरी में अपने प्रियजनों को भीड़भाड़ वाले कब्रिस्तानों में दफनाना पड़ता है या फिर पुरानी कब्रों का दोबारा उपयोग करना पड़ता है। यह स्थिति समुदाय के लिए बेहद पीड़ादायक और असहज है।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि कई क्षेत्रों में जमीन माफिया द्वारा कब्रिस्तान की जमीन पर कब्जा कर लिया गया है, जिससे समस्या और गंभीर हो गई है। पेशावर के गोरा, वजीर बाग, कोहाटी और नौथिया जैसे ऐतिहासिक कब्रिस्तान, जो 1947 से पहले स्थापित किए गए थे, अब अपनी क्षमता से अधिक भर चुके हैं और बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

स्थानीय समुदाय के लोगों का कहना है कि हालात इतने खराब हैं कि कई बार पुरानी कब्रों से शव निकालकर नई लाशों को दफनाने की जगह बनाई जाती है। इससे परिवारों के बीच विवाद की स्थिति भी उत्पन्न होती है और मानसिक पीड़ा भी बढ़ती है। सरकारी कर्मचारी जुल्फिकार मसीह ने नाराजगी जताते हुए कहा कि अल्पसंख्यकों को बराबरी का नागरिक होने के बावजूद बुनियादी अधिकार, जैसे सम्मानजनक अंतिम संस्कार, भी नसीब नहीं हो रहा है।

यह समस्या केवल ईसाई समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि हिंदू और सिख समुदाय भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। हालांकि सरकार और संबंधित अधिकारियों द्वारा इस समस्या को हल करने के वादे किए गए हैं, लेकिन जमीन पर अब तक कोई ठोस कदम नजर नहीं आया है।

2023 की जनगणना के अनुसार, पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की आबादी लगभग 3.3 प्रतिशत है, जो पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा, इस्लामाबाद और बलूचिस्तान में निवास करती है। इसके बावजूद, सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कब्रिस्तान के लिए आवंटित फंड का प्रभावी उपयोग नहीं हुआ है और इसका कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है।

सामाजिक कार्यकर्ता हारून सरबद्याल ने कहा कि सरकार द्वारा दूर-दराज के इलाकों में कब्रिस्तान बनाने का प्रस्ताव व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि इससे लोगों को पहुंचने में कठिनाई होगी और सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी बढ़ेंगी। उनका कहना है कि अल्पसंख्यकों को उनके मौलिक अधिकार देने में लगातार उपेक्षा की जा रही है।

एक और चिंता की बात यह है कि खैबर पख्तूनख्वा सरकार में अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व लगभग न के बराबर है, जिससे उनकी समस्याएं सीधे सरकार तक नहीं पहुंच पातीं। स्थानीय लोगों और कार्यकर्ताओं ने कई बार इस मुद्दे को उठाने की कोशिश की है, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं मिली है।

यह रिपोर्ट दर्शाती है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय आज भी बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है। यहां तक कि मृत्यु के बाद भी उन्हें सम्मानजनक स्थान और अंतिम विदाई के अधिकार के लिए जूझना पड़ रहा है। स्थिति में सुधार के लिए तत्काल और प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है, ताकि सभी समुदायों को समान अधिकार और सम्मान मिल सके।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *