3 Aug 2026, Mon

‘गालीबाज छात्रों को सामुदायिक सेवा करने का आदेश दें’, एयरफोर्स के रिटायर्ड अफसर पहुंचे सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली: सोशल मीडिया पर कथित रूप से अपशब्दों के इस्तेमाल से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। याचिका में मांग की गई है कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्तियों के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने वाले छात्रों और युवाओं के मामलों में दंडात्मक कार्रवाई के बजाय सामुदायिक सेवा जैसे सुधारात्मक उपायों पर विचार किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई है और मामले को बुधवार के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

याचिका एक एयरफोर्स के रिटायर्ड अधिकारी की ओर से दायर की गई है। उन्होंने दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए एक प्रदर्शन के बाद सोशल मीडिया पर सामने आए कथित अपशब्दों और अभद्र टिप्पणियों का हवाला देते हुए अदालत से दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस तरह के मामलों में केवल आपराधिक कार्रवाई पर्याप्त नहीं है, बल्कि युवाओं को समाज के प्रति जिम्मेदारी का एहसास कराने के लिए सामुदायिक सेवा जैसे उपाय अधिक प्रभावी हो सकते हैं।

जंतर-मंतर प्रदर्शन का दिया गया हवाला

याचिका में 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुए एक छात्र प्रदर्शन का उल्लेख किया गया है। उस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव की स्थिति बनी थी। पुलिस द्वारा लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल की खबरें सामने आई थीं, जबकि प्रदर्शन के दौरान कुछ स्थानों पर पथराव की घटनाओं की भी सूचना मिली थी। इस पूरे घटनाक्रम में पुलिसकर्मियों और कुछ प्रदर्शनकारियों के घायल होने की बात भी सामने आई थी।

प्रदर्शन के बाद सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हुए, जिनमें कुछ युवाओं द्वारा कथित रूप से अभद्र भाषा का इस्तेमाल किए जाने के आरोप लगे। इनमें से एक वीडियो में एक नाबालिग लड़की द्वारा प्रधानमंत्री के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी किए जाने का दावा किया गया था। वीडियो वायरल होने के बाद संबंधित मामले में एफआईआर दर्ज होने की खबर भी सामने आई।

माफी का वीडियो भी आया था सामने

बाद में संबंधित लड़की ने एक वीडियो जारी कर माफी मांगी थी। उसने कथित रूप से कहा था कि वह दूसरों के प्रभाव में आकर ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर बैठी और उसे अपने व्यवहार पर पछतावा है। इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिली और मामले पर राजनीतिक तथा सामाजिक स्तर पर भी बहस हुई।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि नाबालिगों और छात्रों से जुड़े ऐसे मामलों में न्यायालय को सुधारात्मक दृष्टिकोण अपनाने पर विचार करना चाहिए। उनके अनुसार, यदि अदालत सामुदायिक सेवा, सार्वजनिक जागरूकता अभियान या सामाजिक कार्य जैसी गतिविधियों का निर्देश देती है, तो इससे युवाओं में जिम्मेदारी और संवेदनशीलता की भावना विकसित हो सकती है।

आयोजकों की जवाबदेही की भी मांग

याचिका में प्रदर्शन आयोजकों की जवाबदेही तय करने की भी मांग की गई है। इसमें कहा गया है कि यदि किसी प्रदर्शन के दौरान हिंसा, अभद्र भाषा या सार्वजनिक व्यवस्था भंग होने जैसी घटनाएं होती हैं, तो संबंधित आयोजकों की भूमिका की भी जांच की जानी चाहिए।

अब इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई बुधवार को होगी। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत इस दौरान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सोशल मीडिया पर जिम्मेदार व्यवहार और सुधारात्मक न्याय के बीच संतुलन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार कर सकती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *