11 Feb 2026, Wed

रामायण’ में लक्ष्मण के अंदर संजीवीनी बूटी से प्राण फूंकने वाले सुषेण वैद्य याद हैं? कभी बेचते थे पान, अब बदली परिवार की तकदीर

रामानंद सागर की ‘रामायण’ भारतीय टेलीविजन इतिहास की ऐसी अमूल्य धरोहर है, जिसने दशकों बाद भी दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बनाए रखी है। इस शो की सबसे बड़ी खूबी इसकी सटीक कास्टिंग थी, जिसने राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान और सुग्रीव जैसे किरदारों को जीवंत बना दिया। वहीं, छोटा लेकिन यादगार किरदार था सुषेण वैद्य, जो संजीवनी बूटी से लक्ष्मण का इलाज करते हैं।

पान वाले से कलाकार तक का सफर

सुषेण वैद्य का किरदार निभाने वाले रमेश चौरसिया मूल रूप से मध्य प्रदेश के उज्जैन के निवासी थे। पेशे से वे पान बेचने वाले थे और अभिनय की दुनिया से उनका कोई लेना-देना नहीं था। रामायण में इस रोल के लिए उन्हें मौका मिला, जिसे रमेश ने अपनी सादगी और नैसर्गिक व्यक्तित्व के चलते हासिल किया।

रमेश का चयन अरविंद त्रिवेदी ने किया था, जिन्होंने रामायण में रावण का किरदार निभाया था। अरविंद और रमेश के अच्छे दोस्त होने के कारण रमेश का नाम रामानंद सागर को सुझाया गया। उनकी सरलता और सहजता ने सागर को प्रभावित किया और उन्हें सुषेण वैद्य का किरदार निभाने का अवसर मिला।

छोटे रोल का बड़ा प्रभाव

स्क्रीन पर रमेश का समय कम था, लेकिन उनका किरदार कहानी के सबसे अहम मोड़ों में से एक में मौजूद था। संजीवनी बूटी से लक्ष्मण की जान बचाने वाले वैद्य की भूमिका दर्शकों के दिलों में इतनी गहराई से बैठ गई कि लोग आज भी सुषेण वैद्य को याद करते हैं।

रामायण के बाद की जिंदगी

रामायण में भूमिका निभाने के बाद रमेश चौरसिया की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। उनकी पान की दुकान उज्जैन में मशहूर हो गई और लोग दूर-दूर से उनकी दुकान पर आने लगे। कई लोग उन्हें असल जिंदगी में भी सुषेण वैद्य मानने लगे और उनके पान को औषधीय गुणों वाला समझने लगे।

रमेश ने अपने जीवन में इस भूमिका को सबसे बड़ी उपलब्धि माना। बिना किसी अभिनय अनुभव के देश के सबसे बड़े धार्मिक धारावाहिक का हिस्सा बनना उनके लिए गर्व की बात थी।

उनकी यादें आज भी जीवित

हालांकि रमेश अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उज्जैन के देवास गेट बस स्टैंड पर उनकी यादें आज भी जीवित हैं। वहां उनकी नमकीन की दुकान और एक होटल चलता है, जिसका नाम उन्होंने ‘संजीवनी’ रखा था। दुकान में आज भी उनके सुषेण वैद्य के रूप में तस्वीरें लगी हैं, जो उनके योगदान और सरल जीवन को याद दिलाती हैं।

रमेश चौरसिया की कहानी इस बात का प्रतीक है कि सादगी, सरलता और नैसर्गिक प्रतिभा कभी भी किसी को बड़ा अवसर दिला सकती है और आम इंसान भी बड़े इतिहास का हिस्सा बन सकता है।

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