रक्षा बंधन भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और स्नेह का प्रतीक माना जाता है। इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं और उसकी लंबी उम्र, सुख-समृद्धि तथा अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं। हिंदू धर्म में किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले शुभ मुहूर्त देखने की परंपरा रही है। इसी वजह से रक्षा बंधन के दिन भी राखी बांधने के समय का विशेष ध्यान रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भद्रा काल में राखी बांधना शुभ नहीं माना जाता।
लेकिन आखिर भद्रा कौन हैं और उनके समय को शुभ कार्यों के लिए अनुकूल क्यों नहीं माना जाता? इसके पीछे पौराणिक मान्यताओं और पंचांग से जुड़ी एक विशेष कथा बताई जाती है।
कौन हैं भद्रा?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, भद्रा सूर्य देव और छाया की पुत्री तथा शनिदेव की बहन मानी जाती हैं। उनका स्वरूप बेहद उग्र बताया गया है। मान्यता है कि उनका स्वभाव बचपन से ही काफी क्रोधी था और वह मांगलिक कार्यों तथा यज्ञ आदि में बाधा उत्पन्न करने लगी थीं। उनके इस स्वभाव के कारण सूर्य देव भी उनके भविष्य को लेकर चिंतित थे।
कहा जाता है कि भद्रा के विवाह को लेकर कई परेशानियां सामने आईं और उनके उग्र स्वभाव के कारण लोग उनसे संबंध बनाने से पीछे हटने लगे। इसके बाद सूर्य देव ने इस समस्या के समाधान के लिए ब्रह्मा जी से सलाह ली।
ब्रह्मा जी ने दिया विशेष स्थान
धार्मिक कथा के अनुसार, ब्रह्मा जी ने भद्रा को पंचांग में एक विशेष स्थान प्रदान किया। उन्हें यह अधिकार दिया गया कि वह निर्धारित समय के दौरान तीनों लोकों में विचरण कर सकें। मान्यता है कि जो व्यक्ति उस अवधि में शुभ कार्य करता है और भद्रा का सम्मान नहीं करता, उसके काम में बाधाएं आ सकती हैं।
इसी मान्यता के आधार पर भद्रा को पंचांग के विष्टि करण में स्थान मिला। यही विष्टि करण ज्योतिषीय गणना में भद्रा के नाम से जाना जाता है।
पंचांग में भद्रा का स्थान
हिंदू पंचांग के पांच प्रमुख अंग माने जाते हैं—तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। इनमें करण तिथि का आधा भाग होता है। एक तिथि में दो करण होते हैं। कुल 11 करण माने गए हैं, जिनमें सात चर और चार स्थिर करण शामिल होते हैं।
चर करणों में बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज और विष्टि शामिल हैं। इनमें विष्टि करण को ही भद्रा कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इस अवधि को मांगलिक कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता।
किन तिथियों में आती हैं भद्रा?
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, भद्रा अलग-अलग तिथियों के निर्धारित हिस्सों में रहती हैं। शुक्ल पक्ष की अष्टमी और पूर्णिमा के पूर्वार्ध में, चतुर्थी और एकादशी के उत्तरार्ध में तथा कृष्ण पक्ष की तृतीया और दशमी के उत्तरार्ध में भद्रा का समय माना जाता है। इसके अलावा सप्तमी और चतुर्दशी के पूर्वार्ध में भी भद्रा रहने की गणना की जाती है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब भद्रा पृथ्वी लोक में होती हैं, तब इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों को करने से बचने की सलाह दी जाती है। इसी वजह से रक्षा बंधन पर भी भद्रा काल का विशेष ध्यान रखा जाता है।
हालांकि, भद्रा से जुड़ी ये बातें धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं। अलग-अलग पंचांग और परंपराओं के अनुसार शुभ मुहूर्त में थोड़ा अंतर हो सकता है। इसलिए रक्षा बंधन पर राखी बांधने से पहले स्थानीय पंचांग के अनुसार भद्रा की स्थिति और शुभ समय देखना उचित माना जाता है।

