11 Feb 2026, Wed

क्या ईरान में मंडरा रहा है बड़ा खतरा? ट्रंप के हमले की धमकी के बीच खमेनेई ने पहली बार तोड़ी 37 साल पुरानी परंपरा

तेहरान: खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका की सैन्य गतिविधियों और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की संभावित कार्रवाई की धमकियों के बीच ईरान से चौंकाने वाली खबर आई है। ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खमेनेई ने पिछले 37 वर्षों से चली आ रही परंपरा को तोड़ते हुए वायुसेना कमांडरों के साथ अपनी वार्षिक बैठक में पहली बार शामिल नहीं हुए।

37 साल पुरानी परंपरा

8 फरवरी का दिन ईरान में ऐतिहासिक महत्व रखता है। इसी दिन 1979 में वायुसेना के अधिकारियों ने इस्लामी क्रांति के संस्थापक रूहोल्ला खमेनी के प्रति निष्ठा की शपथ ली थी, जिससे पहलवी वंश का पतन हुआ। 1989 से खमेनेई हर साल इस बैठक की अध्यक्षता करते रहे हैं। COVID-19 महामारी के दौरान भी उन्होंने परंपरा नहीं तोड़ी थी। इस बार उनकी जगह सशस्त्र बलों के चीफ ऑफ स्टाफ अब्दुलरहीम मौसावी ने कमांडरों से मुलाकात की।

अमेरिकी सैन्य बढ़त और खतरे

खमेनेई की अनुपस्थिति को उनके सुरक्षा कारणों और बढ़ते युद्ध के खतरों से जोड़ा जा रहा है। अमेरिका ने खाड़ी क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा दी है। विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन अरब सागर में तैनात है, जबकि जॉर्डन और लाल सागर में एफ-15 लड़ाकू विमान, ड्रोन और मिसाइल विध्वंसक पोत सक्रिय हैं। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने मिसाइल शस्त्रागार पर भी बातचीत करे, जबकि ईरान केवल परमाणु कार्यक्रम पर चर्चा करना चाहता है।

ईरान की चेतावनी

ईरान ने साफ कहा है कि अगर युद्ध होता है, तो यह पूरे मध्य पूर्व में फैल सकता है। यह बयान जून 2025 में हुए 12 दिवसीय ईरान-इजरायल युद्ध के बाद पैदा हुए तनावपूर्ण माहौल में आया है। खमेनेई की अनुपस्थिति को दो तरह से देखा जा रहा है – पहला, संभावित अमेरिकी स्ट्राइक या जासूसी के डर से उन्हें सुरक्षित स्थान पर रखा गया हो, दूसरा, वे राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य रणनीति तैयार करने में व्यस्त हों।

क्षेत्रीय और वैश्विक चिंता

खाड़ी में अमेरिकी निगरानी ड्रोन MQ-4C Triton और टोही विमान P-8 Poseidon की सक्रियता ने तेहरान की चिंताओं को और बढ़ा दिया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि खमेनेई की अनुपस्थिति और अमेरिका की सैन्य तैयारी से मध्य पूर्व में संभावित तनाव और संघर्ष का खतरा बढ़ गया है।

यह स्थिति न केवल ईरान और अमेरिका, बल्कि पूरे खाड़ी क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चिंता का विषय बन गई है। क्षेत्रीय देशों और वैश्विक शक्तियों की नजर अब हर कदम पर टिकी हुई है।

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