6 Apr 2026, Mon

RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की मीटिंग शुरू, बुधवार को होगी फैसलों की घोषणा

RBI MPC Meeting: रेपो रेट में 1.25% कटौती के बाद अब 5.25% पर नजर, महंगाई और वैश्विक संकट बड़ा फैक्टर

भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की तीन दिवसीय बैठक सोमवार से शुरू हो गई है। यह चालू वित्त वर्ष की पहली द्विमासिक समीक्षा बैठक है, जिसका निर्णय बुधवार, 8 अप्रैल को घोषित किया जाएगा। इस बैठक पर देश और बाजार की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इससे लोन और ब्याज दरों पर सीधा असर पड़ सकता है।


रेपो रेट में बड़ी कटौती

फरवरी 2025 से अब तक आरबीआई ने नीतिगत दर यानी रेपो रेट में कुल 1.25 प्रतिशत की कटौती की है। यह 2019 के बाद से सबसे बड़ी कटौती मानी जा रही है।

हाल ही में दिसंबर 2025 में रेपो रेट में 0.25 प्रतिशत की कटौती की गई थी, जबकि पिछली बैठक (फरवरी) में इसे 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखा गया था।


मौजूदा बैठक में क्या हो सकता है फैसला

इस बार की MPC बैठक में भी रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर बनाए रखने की संभावना जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती महंगाई और वैश्विक अनिश्चितताओं को देखते हुए आरबीआई अभी कोई बड़ा बदलाव नहीं करेगा।

आरबीआई के गवर्नर Sanjay Malhotra की अध्यक्षता में 6 सदस्यीय समिति इस बैठक में फैसले ले रही है।


पश्चिम एशिया संकट का असर

पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा भी बढ़ गया है। कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक लगभग 60 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थीं, लेकिन हाल के संघर्ष के बाद यह बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, अगर कच्चे तेल की कीमतों में 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी होती है, तो महंगाई करीब 0.60 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।


महंगाई और आरबीआई का लक्ष्य

आरबीआई का लक्ष्य खुदरा महंगाई को 4 प्रतिशत (+/- 2%) के दायरे में रखना है। हाल के आंकड़ों के अनुसार, महंगाई इस लक्ष्य के करीब पहुंच गई है, लेकिन तेल की कीमतों में तेजी चिंता का कारण बनी हुई है।

कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव और घरेलू मुद्रा की कमजोरी भी इस निर्णय में अहम भूमिका निभा रही है।


भारतीय मुद्रा में गिरावट

पश्चिम एशिया संकट के बाद भारतीय मुद्रा में 4 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। इसका असर आयातित महंगाई पर भी पड़ा है, जिससे देश में वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

मुद्रा में गिरावट से डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी बढ़ती है, जिसका सीधा असर तेल और अन्य आयातित वस्तुओं पर पड़ता है।


RBI की रणनीति

विशेषज्ञों का मानना है कि आरबीआई फिलहाल अपने “न्यूट्रल” रुख को बनाए रख सकता है। इसका मतलब है कि बैंक किसी भी दिशा में जल्दबाजी में सख्त या ढील देने वाला कदम नहीं उठाएगा।

आरबीआई का फोकस महंगाई को नियंत्रित रखते हुए आर्थिक स्थिरता बनाए रखना है।


लोन और आम जनता पर असर

अगर रेपो रेट में बदलाव नहीं होता है, तो लोन की ब्याज दरों में भी कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा। हालांकि, यदि भविष्य में रेपो रेट बढ़ाया या घटाया जाता है, तो इसका सीधा असर होम लोन, कार लोन और अन्य कर्ज की EMI पर पड़ेगा।


निष्कर्ष

Reserve Bank of India की इस महत्वपूर्ण बैठक में देश की आर्थिक दिशा तय करने वाले फैसले लिए जाएंगे। जहां एक ओर महंगाई और वैश्विक तनाव दबाव बना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आर्थिक स्थिरता बनाए रखना भी बड़ी चुनौती है।

अब सभी की नजर बुधवार को आने वाले आरबीआई के फैसले पर टिकी है, जो आने वाले महीनों में बाजार और आम लोगों दोनों को प्रभावित करेगा।

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