नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) और नेशनल कंपनी लॉ अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) के कामकाज में स्वायत्तता को लेकर कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि मंत्रालय ने इन दोनों महत्वपूर्ण संस्थाओं पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित कर लिया है, जिससे उनकी स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि ट्रिब्यूनल के अध्यक्षों को नियुक्तियों के मामले में पर्याप्त अधिकार और स्वायत्तता दी जानी चाहिए।
यह टिप्पणी संविदा पर काम कर रहे कर्मचारियों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई। मामले में कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा, लंबे समय से सेवा दे रहे लोगों के अधिकार और भविष्य में होने वाली नियुक्तियों को लेकर चिंता जताई गई।
ट्रिब्यूनल की स्वतंत्रता पर अदालत ने जताई चिंता
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि NCLT और NCLAT जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं को स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर मिलना चाहिए। अदालत के अनुसार, मंत्रालय का अत्यधिक नियंत्रण संस्थागत स्वायत्तता के लिए उचित नहीं है।
पीठ ने नियुक्तियों की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए और कहा कि ट्रिब्यूनल के अध्यक्षों को कर्मचारियों की भर्ती से जुड़े मामलों में पर्याप्त अधिकार दिए जाने चाहिए। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक और तकनीकी संस्थाओं के कामकाज में प्रशासनिक हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए, ताकि उनकी कार्यक्षमता और स्वतंत्रता बनी रहे।
नियमित भर्ती के लिए UPSC और SSC का सुझाव
सुनवाई के दौरान अदालत ने भर्ती प्रक्रिया को व्यवस्थित बनाने के लिए संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और कर्मचारी चयन आयोग (SSC) के माध्यम से चरणबद्ध तरीके से नियमित नियुक्तियां करने का सुझाव दिया। साथ ही, अंतरिम व्यवस्था के तौर पर प्रतिनियुक्ति के विकल्प पर भी विचार करने की बात कही।
पीठ ने संविदा कर्मचारियों की नियुक्ति और उनके कामकाज से जुड़े मुद्दों पर चिंता जताई। अदालत का मानना था कि ट्रिब्यूनल जैसे संस्थानों में कर्मचारियों की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिससे कामकाज प्रभावित न हो और प्रशासनिक जरूरतों के साथ संस्थागत स्वतंत्रता का भी ध्यान रखा जा सके।
संविदा कर्मचारियों की नौकरी पर संकट
याचिका दायर करने वाले कर्मचारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने अदालत को बताया कि कई कर्मचारी लंबे समय से NCLT और NCLAT में सेवाएं दे रहे हैं। उन्होंने दलील दी कि ऐसे कर्मचारियों को अचानक नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि उन्होंने वर्षों तक संस्थानों के कामकाज में योगदान दिया है।
अधिवक्ता ने आशंका जताई कि मौजूदा कर्मचारियों को नवंबर की शुरुआत में काम से हटाया जा सकता है और उनकी जगह निजी कंपनी के माध्यम से नियुक्तियां की जा सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि लंबे समय तक काम करने वाले संविदा कर्मचारियों के अधिकारों पर विचार किया जाना चाहिए।
नियमितीकरण और कर्मचारियों के अधिकारों पर बहस
सुनवाई के दौरान कर्मचारियों के नियमितीकरण का मुद्दा भी उठाया गया। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि भर्ती नियमों और संबंधित विज्ञापन में नियमितीकरण से जुड़ी व्यवस्था का उल्लेख किया गया है। ऐसे में कर्मचारियों के भविष्य और उनके सेवा संबंधी अधिकारों पर विचार जरूरी है।
फिलहाल, अदालत की टिप्पणियों ने NCLT और NCLAT की प्रशासनिक स्वतंत्रता तथा संविदा कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा से जुड़े सवालों को प्रमुखता से सामने ला दिया है। मामले में आगे की सुनवाई और अदालत के निर्देशों पर कर्मचारियों के भविष्य के साथ-साथ इन संस्थानों की भर्ती व्यवस्था का स्वरूप भी निर्भर कर सकता है।

