अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर उत्तर अटलांटिक संगठन (नाटो) देशों पर कड़ा हमला बोला है। ट्रंप ने हाल ही में दिए बयान में कहा कि नाटो देशों ने पागल ईरान राष्ट्र के खिलाफ अमेरिका की मदद नहीं की, जबकि अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई पूरी तरह से सफलतापूर्वक की। उनके अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका को नाटो से किसी प्रकार की मदद की जरूरत नहीं थी, लेकिन यह बेहद महत्वपूर्ण समय था जिसे “कभी मत भूलना” चाहिए। उनके इस बयान को विशेषज्ञों ने नाटो देशों को चेतावनी और सीधे तौर पर धमकी के रूप में देखा है।
ट्रंप ने विशेष रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा और खुलवाने के लिए नाटो देशों से सहयोग की अपील की थी। इस जलडमरूमध्य का वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में बेहद अहम रोल है, क्योंकि यहां से दुनिया का लगभग 20 फीसदी क्रूड ऑयल गुजरता है। ट्रंप ने उम्मीद जताई थी कि नाटो देश अपनी सेनाओं के जरिए इस रणनीतिक मार्ग को सुरक्षित करेंगे, लेकिन उनके अनुसार किसी भी देश ने इस आपातकालीन स्थिति में कदम नहीं बढ़ाया।
पूर्व राष्ट्रपति ने नाटो के व्यवहार को लेकर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि कई देश कागजी शेर और डरपोक साबित हुए हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि नाटो देशों ने अमेरिका के भरोसे को तोड़ा और यह गद्दारी जैसी स्थिति थी। ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका को किसी बाहरी मदद की जरूरत नहीं थी, लेकिन उन देशों की असहयोगी मानसिकता को अमेरिका आगे याद रखेगा।
विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप का यह बयान नाटो और अमेरिका के बीच कूटनीतिक तनाव को बढ़ा सकता है। अमेरिकी रणनीतिक और रक्षा विशेषज्ञ इसे ट्रंप की विदेश नीति की शैली का हिस्सा मान रहे हैं, जिसमें वे गठबंधन देशों की आलोचना करते हुए अपनी ताकत और स्वतंत्र कार्रवाई की क्षमता को उजागर करना चाहते हैं।
हालांकि, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का मामला सिर्फ नाटो सहयोग का ही नहीं है, बल्कि वैश्विक तेल और ऊर्जा सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। यदि यह जलडमरूमध्य बंद रहता है, तो विश्व बाजार में तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव हो सकता है। ट्रंप ने अपने बयान में इसे नाटो देशों की जिम्मेदारी और सहयोग की कमी से जोड़ा है।
ट्रंप ने मीडिया के सामने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका ने ईरान पर सफल सैन्य कार्रवाई की है और नाटो के सहयोग के बिना ही अपने लक्ष्यों को प्राप्त किया। उनके अनुसार, अमेरिका अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों को किसी भी स्थिति में अकेले ही संभाल सकता है।
इस बयान के बाद, नाटो के सदस्य देशों पर यह दबाव बढ़ सकता है कि वे अमेरिका के साथ अपने सहयोग और प्रतिबद्धता को दोबारा परिभाषित करें। वहीं, ट्रंप के समर्थक इसे अमेरिका की शक्ति और स्वतंत्र निर्णय क्षमता का उदाहरण मान रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप का यह हमला नाटो देशों को चेतावनी देने के साथ-साथ अमेरिका की सैन्य और कूटनीतिक क्षमता का प्रदर्शन भी है। इसके अलावा, यह बयान मध्य-पूर्व में अमेरिका की नीति और रणनीति के प्रति दुनिया के नजरिए को भी प्रभावित कर सकता है।
संक्षेप में, डोनाल्ड ट्रंप का नाटो देशों पर हमला और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलवाने में मदद न मिलने की शिकायत अमेरिका और यूरोपीय गठबंधन के बीच कूटनीतिक जटिलताओं को और बढ़ा सकती है। ट्रंप ने अपने बयान के माध्यम से स्पष्ट किया है कि अमेरिका किसी भी संकट में अकेले अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों की रक्षा करने में सक्षम है, जबकि नाटो देशों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं।

