Durga Chalisa Lyrics in Hindi: चैत्र नवरात्रि में श्री दुर्गा चालीसा का महत्व और संपूर्ण पाठ
चैत्र नवरात्रि, जिसे बसंत नवरात्रि भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखती है। इस दौरान मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है और भक्त पूरे श्रद्धा भाव से व्रत, पूजा और पाठ करते हैं। नवरात्रि के इन पावन दिनों में श्री दुर्गा चालीसा का नियमित पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि नवरात्रि के नौ दिनों तक रोजाना दुर्गा चालीसा पढ़ने से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों की सभी प्रकार के कष्टों से रक्षा करती हैं।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, दुर्गा चालीसा का पाठ करने से न केवल आध्यात्मिक शांति मिलती है, बल्कि मानसिक संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा भी प्राप्त होती है। यह पाठ व्यक्ति के जीवन में साहस, आत्मविश्वास और शक्ति का संचार करता है। नवरात्रि में विशेष रूप से सुबह या शाम के समय श्रद्धा और एकाग्रता के साथ इसका पाठ करना लाभकारी माना जाता है।
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है और इसके बाद क्रमशः मां ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजा होती है। इन सभी स्वरूपों की कृपा प्राप्त करने के लिए दुर्गा चालीसा का पाठ एक प्रभावी साधन माना गया है।
दुर्गा चालीसा में मां दुर्गा के विभिन्न रूपों, उनके गुणों और उनकी महिमा का वर्णन किया गया है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार मां ने विभिन्न असुरों का संहार कर धर्म की स्थापना की और अपने भक्तों की रक्षा की। यही कारण है कि यह चालीसा भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है और नवरात्रि के दौरान इसका पाठ विशेष रूप से किया जाता है।
श्री दुर्गा चालीसा (पाठ)
नमो नमो दुर्गे सुख करनी।
नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥
निरंकार है ज्योति तुम्हारी।
तिहूं लोक फैली उजियारी॥
शशि ललाट मुख महाविशाला।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥
रूप मातु को अधिक सुहावे।
दरश करत जन अति सुख पावे॥
तुम संसार शक्ति लै कीना।
पालन हेतु अन्न धन दीना॥
अन्नपूर्णा हुई जग पाला।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥
प्रलयकाल सब नाशन हारी।
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥
रूप सरस्वती को तुम धारा।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥
धरयो रूप नरसिंह को अम्बा।
परगट भई फाड़कर खम्बा॥
रक्षा करि प्रह्लाद बचायो।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।
श्री नारायण अंग समाहीं॥
क्षीरसिन्धु में करत विलासा।
दयासिन्धु दीजै मन आसा॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।
महिमा अमित न जात बखानी॥
मातंगी अरु धूमावति माता।
भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥
श्री भैरव तारा जग तारिणी।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥
केहरि वाहन सोह भवानी।
लांगुर वीर चलत अगवानी॥
कर में खप्पर खड्ग विराजै।
जाको देख काल डर भाजै॥
सोहै अस्त्र और त्रिशूला।
जाते उठत शत्रु हिय शूला॥
नगरकोट में तुम्हीं विराजत।
तिहुँलोक में डंका बाजत॥
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे।
रक्तन बीज शंखन संहारे॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी।
जेहि अघ भार मही अकुलानी॥
रूप कराल कालिका धारा।
सेन सहित तुम तिहि संहारा॥
परी गाढ़ सन्तन पर जब जब।
भई सहाय मातु तुम तब तब॥
आभा पुरी अरु बासव लोका।
तब महिमा सब रहें अशोका॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।
तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावें।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।
जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥
शंकर आचारज तप कीनो।
काम क्रोध जीति सब लीनो॥
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥
शक्ति रूप का मरम न पायो।
शक्ति गई तब मन पछितायो॥
शरणागत हुई कीर्ति बखानी।
जय जय जय जगदम्ब भवानी॥
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा।
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥
आशा तृष्णा निपट सतावें।
रिपु मुरख मोही डरपावे॥
शत्रु नाश कीजै महारानी।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥
करो कृपा हे मातु दयाला।
ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला।।
जब लगि जियऊं दया फल पाऊं।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं॥
श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै।
सब सुख भोग परमपद पावै॥
देवीदास शरण निज जानी।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥
॥इति श्रीदुर्गा चालीसा सम्पूर्ण॥

