सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र समय माना जाता है। इस दौरान भक्त शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, भांग और आक के फूल अर्पित कर भोलेनाथ की पूजा करते हैं। लेकिन एक फूल ऐसा है जिसे शिव पूजा में चढ़ाना वर्जित माना गया है और वह है केतकी का फूल। धार्मिक मान्यता के अनुसार, केतकी का पुष्प भगवान विष्णु को प्रिय माना जाता है, लेकिन इसे भगवान शिव को अर्पित नहीं किया जाता। इसके पीछे शिव पुराण में वर्णित एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा है।
ब्रह्मा और विष्णु के बीच हुआ विवाद
शिव पुराण के अनुसार, एक बार ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच इस बात को लेकर विवाद हो गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। यह विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों ने महादेव से इसका निर्णय करने की प्रार्थना की।
तब भगवान शिव ने अपनी दिव्य शक्ति से एक विशाल और अनंत ज्योतिर्लिंग प्रकट किया। यह शिवलिंग इतना विराट था कि उसका न तो आदि दिखाई दे रहा था और न ही अंत।
शिव ने दी कठिन परीक्षा
महादेव ने ब्रह्मा और विष्णु से कहा कि जो इस अनंत शिवलिंग का आदि या अंत खोज लेगा, वही श्रेष्ठ माना जाएगा।
कथा के अनुसार, ब्रह्माजी शिवलिंग का आदि खोजने नीचे की दिशा में गए, जबकि भगवान विष्णु उसका अंत खोजने ऊपर की ओर प्रस्थान कर गए।
लंबे समय तक प्रयास करने के बाद भी दोनों देवता शिवलिंग का कोई सिरा नहीं खोज पाए।
विष्णु ने स्वीकार किया सत्य
काफी प्रयास के बाद भगवान विष्णु वापस लौट आए और उन्होंने महादेव के सामने स्वीकार कर लिया कि वह शिवलिंग का अंत नहीं खोज सके।
उन्होंने अपनी असफलता स्वीकार करते हुए भगवान शिव के सामने नतमस्तक होकर सत्य का पालन किया।
ब्रह्माजी ने केतकी से मांगी गवाही
दूसरी ओर ब्रह्माजी भी शिवलिंग का आदि नहीं खोज पाए। वापस लौटते समय उन्हें केतकी का फूल दिखाई दिया।
अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए ब्रह्माजी ने केतकी पुष्प से अनुरोध किया कि वह महादेव के सामने यह गवाही दे कि ब्रह्माजी शिवलिंग का आदि खोज चुके हैं।
कथा के अनुसार, केतकी पुष्प ने ब्रह्माजी की बात का समर्थन करने के लिए सहमति दे दी।
महादेव ने दिया श्राप
जब ब्रह्माजी केतकी पुष्प को साथ लेकर महादेव के पास पहुंचे, तो उन्होंने दावा किया कि उन्होंने शिवलिंग का आदि खोज लिया है।
केतकी फूल ने भी ब्रह्माजी के इस कथन की पुष्टि कर दी।
लेकिन भगवान शिव सर्वज्ञ थे। उन्हें पता था कि ब्रह्माजी असत्य बोल रहे हैं और केतकी पुष्प झूठी गवाही दे रहा है।
इस पर महादेव क्रोधित हो गए और उन्होंने ब्रह्माजी को श्राप दिया कि पृथ्वी पर उनकी पूजा व्यापक रूप से नहीं होगी।
इसके साथ ही केतकी पुष्प को भी श्राप दिया कि उसे कभी भी शिव पूजा में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
इसलिए नहीं चढ़ाया जाता केतकी फूल
धार्मिक मान्यता के अनुसार, उसी समय से केतकी का फूल भगवान शिव को अर्पित करना निषिद्ध माना गया।
यही कारण है कि शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, भांग, आक और अन्य प्रिय वस्तुएं चढ़ाई जाती हैं, लेकिन केतकी पुष्प नहीं चढ़ाया जाता।
सावन के महीने में शिव पूजा करते समय इस धार्मिक मान्यता का विशेष ध्यान रखा जाता है। हालांकि, यह मान्यता शिव पुराण और परंपरागत धार्मिक आस्थाओं पर आधारित है और इसका महत्व श्रद्धा और विश्वास से जुड़ा हुआ है।

