वॉशिंगटन: अमेरिका में H-1B वीजा को लेकर डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को बड़ा झटका लगा है। बोस्टन स्थित फर्स्ट सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स की तीन जजों की बेंच ने H-1B वीजा पर 1,00,000 अमेरिकी डॉलर की फीस लगाने के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। अदालत ने ट्रंप प्रशासन की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें जिला अदालत के फैसले पर रोक लगाने की मांग की गई थी।
यह मामला खास तौर पर भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि H-1B वीजा कार्यक्रम के सबसे बड़े लाभार्थियों में भारतीय नागरिक शामिल हैं। अमेरिका की टेक्नोलॉजी, हेल्थकेयर और अन्य विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों की कंपनियां बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवरों को नियुक्त करने के लिए इस वीजा कार्यक्रम पर निर्भर रहती हैं।
ट्रंप प्रशासन की याचिका खारिज
फर्स्ट सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स की तीन सदस्यीय बेंच ने सरकार की उस अपील को खारिज किया, जिसमें अमेरिकी जिला न्यायाधीश लियो टी. सोरोकिन के 8 जून के फैसले पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया था।
जिला अदालत ने H-1B वीजा के लिए 1,00,000 अमेरिकी डॉलर की फीस लगाने के प्रशासन के फैसले को रद्द कर दिया था। अदालत ने इस शुल्क को कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी के बिना लगाया गया अवैध टैक्स माना था। इसके बाद ट्रंप प्रशासन ने जिला अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए अपीलीय अदालत का रुख किया था।
हालांकि, अब अपीलीय अदालत ने भी सरकार को तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया है। इससे H-1B वीजा के जरिए अमेरिका में काम करने की योजना बना रहे विदेशी प्रोफेशनल्स, खासकर भारतीयों को फिलहाल बड़ी राहत मिल सकती है।
अदालत ने क्या कहा?
अपीलीय अदालत ने अपने फैसले में 1989 के अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया। अदालत के मुताबिक, कार्यपालिका को यह स्पष्ट रूप से साबित करना होगा कि कांग्रेस ने उसे वित्तीय बोझ लगाने का अधिकार स्पष्ट शब्दों में दिया है, चाहे उस राशि को ‘फीस’ कहा जाए या ‘टैक्स’।
अदालत ने कहा कि ट्रंप प्रशासन यह स्पष्ट करने में सफल नहीं रहा कि इस मामले में कांग्रेस से स्पष्ट अधिकार मिलने की अनिवार्य शर्त क्यों लागू नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा, सरकार यह भी साबित नहीं कर सकी कि जिला अदालत के फैसले पर रोक नहीं लगाने से वादी राज्यों को कोई गंभीर नुकसान होगा।
क्या है H-1B वीजा?
H-1B वीजा अमेरिका का एक नॉन-इमिग्रेंट वीजा है। इसके जरिए अमेरिकी कंपनियां विशेष कौशल और विशेषज्ञता रखने वाले विदेशी कर्मचारियों को नौकरी पर रख सकती हैं। आमतौर पर यह वीजा टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, हेल्थकेयर और अन्य विशेष क्षेत्रों में काम करने वाले प्रोफेशनल्स के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
अमेरिकी कंपनियां हर साल भारत और चीन जैसे देशों से बड़ी संख्या में कुशल कर्मचारियों की नियुक्ति करती हैं। भारतीय प्रोफेशनल्स लंबे समय से H-1B वीजा कार्यक्रम के सबसे बड़े लाभार्थियों में शामिल रहे हैं।
भारतीय प्रोफेशनल्स को बड़ी राहत
अमेरिकी अदालत के इस फैसले को भारत के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि 1,00,000 अमेरिकी डॉलर की फीस लागू रहती, तो H-1B वीजा के जरिए विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने वाली कंपनियों पर भारी वित्तीय बोझ पड़ सकता था। इसका असर भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और अमेरिका में काम करने की योजना बना रहे कुशल कर्मचारियों पर भी पड़ने की आशंका थी।
अमेरिका हर साल 65,000 नियमित H-1B वीजा जारी करता है, जबकि उच्च शिक्षा प्राप्त विदेशी प्रोफेशनल्स के लिए अतिरिक्त वीजा श्रेणी भी उपलब्ध है। ऐसे में H-1B कार्यक्रम को लेकर ट्रंप प्रशासन और अदालतों के बीच जारी कानूनी लड़ाई पर भारतीय प्रोफेशनल्स और अमेरिकी कंपनियों की नजर बनी हुई है।
फिलहाल अपीलीय अदालत के ताजा फैसले से 1,00,000 अमेरिकी डॉलर की फीस को लेकर ट्रंप प्रशासन को तत्काल राहत नहीं मिली है। हालांकि, इस मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रह सकती है और अंतिम फैसला आने तक H-1B वीजा नीति को लेकर स्थिति पर सभी की नजरें बनी रहेंगी।

