दुनियाभर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब हवाई यात्राओं पर भी पड़ने लगा है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, मध्य पूर्व में जारी संघर्ष, सीमित रिफाइनिंग क्षमता और जेट फ्यूल की घटती उपलब्धता के कारण आने वाले महीनों में एयर टिकट की कीमतों में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा स्थिति बनी रहती है, तो यात्रियों को हवाई सफर के लिए पहले की तुलना में 20 से 25 फीसदी तक अधिक खर्च करना पड़ सकता है।
वैश्विक कंसल्टिंग फर्म मैकिंजी की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के कई हिस्सों में जेट फ्यूल की आपूर्ति दबाव में है। खासतौर पर खाड़ी क्षेत्र और एशियाई देशों में उत्पादन घटने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की उपलब्धता प्रभावित हुई है। यही कारण है कि एयरलाइंस की परिचालन लागत लगातार बढ़ रही है।
मध्य पूर्व तनाव का जेट फ्यूल सप्लाई पर असर
रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया के करीब 40 फीसदी जेट फ्यूल की आपूर्ति खाड़ी क्षेत्र और एशियाई देशों से होती है। हालांकि, मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव और क्षेत्रीय अस्थिरता ने इस सप्लाई चेन को प्रभावित किया है।
इसके अलावा, कई प्रमुख रिफाइनरियां पहले से ही अपनी अधिकतम क्षमता के करीब काम कर रही हैं, जिससे उत्पादन बढ़ाने की संभावना काफी कम हो गई है। ऐसे में वैश्विक बाजार में जेट फ्यूल की कमी और अधिक गहराने की आशंका जताई जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि गर्मियों के ट्रैवल सीजन के दौरान यात्रियों की संख्या में तेज वृद्धि होती है। इस समय जेट फ्यूल की मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है, लेकिन मौजूदा हालात में भंडार पहले से ही कम स्तर पर हैं। मांग और आपूर्ति के बीच बढ़ते अंतर के कारण कीमतों में तेजी देखी जा रही है।
क्या होता है क्रैक स्प्रेड?
रिपोर्ट में जेट फ्यूल के ‘क्रैक स्प्रेड’ का भी उल्लेख किया गया है, जो वर्तमान संकट की गंभीरता को दर्शाता है। क्रैक स्प्रेड कच्चे तेल और उससे तैयार किए जाने वाले ईंधन की कीमतों के बीच के अंतर को कहा जाता है।
आमतौर पर यह अंतर 20 डॉलर प्रति बैरल या उससे कम रहता है, लेकिन 2026 में इसके 50 डॉलर प्रति बैरल से अधिक रहने का अनुमान जताया गया है। इसका अर्थ यह है कि रिफाइनिंग की लागत तेजी से बढ़ रही है और इसका सीधा असर एयरलाइंस की लागत पर पड़ रहा है।
जितना अधिक क्रैक स्प्रेड होगा, एयरलाइंस के लिए ईंधन खरीदना उतना ही महंगा होगा। ऐसे में कंपनियां अपने बढ़े हुए खर्च का बोझ यात्रियों पर डाल सकती हैं।
चीन, भारत और दक्षिण कोरिया के फैसलों का असर
रिपोर्ट के अनुसार, चीन, भारत और दक्षिण कोरिया जैसे प्रमुख जेट फ्यूल निर्यातक देशों ने मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए जेट फ्यूल के निर्यात पर आंशिक प्रतिबंध लगाए हैं। इससे वैश्विक बाजार में ईंधन की उपलब्धता और सीमित हो गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इन देशों के फैसलों से अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखला पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है, जिससे कीमतों में और तेजी आने की संभावना बढ़ गई है।
यात्रियों पर कितना बढ़ेगा बोझ?
मैकिंजी की रिपोर्ट के मुताबिक, किसी एयरलाइन टिकट की कुल लागत में लगभग 30 फीसदी हिस्सा ईंधन लागत का होता है। यदि जेट फ्यूल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी जारी रहती है और एयरलाइंस इस अतिरिक्त लागत का अधिकांश हिस्सा यात्रियों पर डालती हैं, तो हवाई टिकट की कीमतों में 20 से 25 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है।
ऐसे में आने वाले महीनों में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों प्रकार की हवाई यात्राएं महंगी हो सकती हैं। खासकर छुट्टियों और त्योहारों के सीजन में यात्रियों को अपनी यात्रा के लिए पहले से अधिक बजट तैयार रखना पड़ सकता है।

