12 Jun 2026, Fri

पर्शिया से ‘ईरान’ कैसे बना ये देश, किसने दिया था ये नाम; जानिए इसका इतिहास

Iran History: इन दिनों ईरान दुनिया भर में चर्चा का विषय बना हुआ है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक घटनाक्रमों के कारण इस देश पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज जिस देश को हम ईरान के नाम से जानते हैं, उसे कभी पूरी दुनिया “पर्शिया” कहा करती थी? आखिर यह नाम कब और क्यों बदला गया? इसके पीछे क्या ऐतिहासिक और राजनीतिक कारण थे? आइए जानते हैं।

दरअसल, ईरान का आधिकारिक नाम बदलने की प्रक्रिया 1935 में हुई थी। हालांकि “ईरान” शब्द कोई नया नहीं था, बल्कि इसकी जड़ें हजारों साल पुरानी हैं। इतिहासकारों के अनुसार, “ईरान” शब्द मध्य फारसी भाषा के “एरान” से निकला है, जिसका अर्थ है “आर्यों की भूमि”। प्राचीन अवेस्ता ग्रंथों और फारसी साम्राज्य के शिलालेखों में भी इस नाम का उल्लेख मिलता है।

वहीं, “पर्शिया” नाम बाहरी दुनिया द्वारा दिया गया था। यह नाम दक्षिण-पश्चिमी ईरान के “पार्स” क्षेत्र से निकला, जहां से अचमेनिद साम्राज्य का उदय हुआ था। यूनानियों ने इस क्षेत्र को “पर्सिस” कहा और बाद में यही नाम यूरोप और पश्चिमी देशों में “पर्शिया” के रूप में प्रचलित हो गया। हालांकि देश के लोग स्वयं को हमेशा “ईरानी” ही कहते रहे।

साल 1935 में तत्कालीन शासक रेज़ा शाह पहलवी ने देश की राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करने के उद्देश्य से एक बड़ा फैसला लिया। 21 मार्च 1935 को नवरोज के अवसर पर उन्होंने दुनिया भर के देशों और विदेशी प्रतिनिधियों से अनुरोध किया कि वे अपने आधिकारिक दस्तावेजों और पत्राचार में “पर्शिया” की जगह “ईरान” नाम का उपयोग करें। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का आधिकारिक नाम ईरान हो गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव के पीछे केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक और सांस्कृतिक सोच थी। रेज़ा शाह देश को आधुनिक राष्ट्र-राज्य के रूप में स्थापित करना चाहते थे। वे “पर्शिया” को पुराने दौर, राजनीतिक अस्थिरता और औपनिवेशिक प्रभावों से जोड़कर देखते थे। वहीं “ईरान” नाम देश की प्राचीन सभ्यता, सांस्कृतिक विरासत और आर्य मूल की पहचान को मजबूत करता था।

इसके अलावा, रेज़ा शाह ने शिक्षा, सेना, परिवहन और प्रशासनिक सुधारों के जरिए देश को आधुनिक बनाने की दिशा में कई कदम उठाए। नाम परिवर्तन भी उसी राष्ट्रवादी अभियान का हिस्सा था। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक नई और स्वतंत्र पहचान स्थापित करना था।

बाद में 1959 में रेज़ा शाह के पुत्र मोहम्मद रेज़ा शाह पहलवी ने स्पष्ट किया कि “ईरान” और “पर्शिया” दोनों नामों का उपयोग किया जा सकता है। हालांकि आधिकारिक तौर पर “ईरान” ही देश का नाम बना रहा। आज संयुक्त राष्ट्र समेत पूरी दुनिया इस देश को ईरान के नाम से पहचानती है, जबकि “पर्शिया” शब्द अब भी साहित्य, संस्कृति और ऐतिहासिक संदर्भों में देखने को मिलता है।

ईरान का यह नाम परिवर्तन केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं था, बल्कि यह देश की सांस्कृतिक पहचान, राष्ट्रीय गौरव और आधुनिक राष्ट्र निर्माण की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम था।

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