24 Apr 2026, Fri

CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग फिर हुई तेज, राज्यसभा में विपक्ष के 73 सांसदों ने दिया नया नोटिस

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का नया मोर्चा, 73 सांसदों ने हटाने का प्रस्ताव राज्यसभा में दिया

नई दिल्ली: देश की राजनीति में एक बार फिर चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों ने राज्यसभा में नया हटाने का प्रस्ताव पेश किया है। इस प्रस्ताव पर करीब 73 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं, जिनमें पक्षपात और आचार संहिता के उल्लंघन जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

सूत्रों के अनुसार, यह कदम हाल ही में तमिलनाडु विधानसभा की 234 सीटों और पश्चिम बंगाल में पहले चरण के मतदान के बाद उठाया गया है। विपक्षी सांसदों ने राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन को एक विस्तृत पत्र सौंपा है, जिसमें चुनाव आयोग की कार्यशैली पर सवाल उठाए गए हैं।

जांच कमेटी गठित करने की मांग

पत्र में मांग की गई है कि मामले की निष्पक्ष जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की जाए। इसमें सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा जज, किसी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक अन्य न्यायिक सदस्य को शामिल करने का सुझाव दिया गया है। विपक्ष ने कहा है कि यह समिति अपनी रिपोर्ट राज्यसभा के सभापति को सौंपे।

सांसदों ने यह भी मांग की है कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को चुनावी कार्यों से अलग रखा जाए।

पहले भी लाया गया था प्रस्ताव

यह पहली बार नहीं है जब ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग उठी है। इससे पहले 12 मार्च को 63 राज्यसभा सांसदों और 130 लोकसभा सांसदों ने भी उनके खिलाफ प्रस्ताव दिया था। हालांकि, 6 अप्रैल को राज्यसभा के सभापति और लोकसभा अध्यक्ष ने पर्याप्त सबूतों के अभाव में इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।

पक्षपात के गंभीर आरोप

नए प्रस्ताव में विपक्षी सांसदों ने आरोप लगाया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने चुनाव आचार संहिता को लागू करने में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया है। पत्र में 18 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक 29 मिनट के भाषण का उल्लेख किया गया है, जिसे सरकारी चैनलों पर प्रसारित किया गया था।

विपक्ष का आरोप है कि यह भाषण तमिलनाडु में दिए गए एक चुनावी भाषण से काफी मिलता-जुलता था, जिसमें प्रधानमंत्री ने कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी और समाजवादी पार्टी जैसे दलों पर तीखी टिप्पणी की थी और मतदाताओं से इनके खिलाफ वोट करने की अपील की थी।

शिकायतों पर कार्रवाई नहीं करने का आरोप

सांसदों ने यह भी कहा कि 19 और 20 अप्रैल को चुनाव आयोग को कई शिकायतें भेजी गई थीं, जिनमें करीब 700 नागरिकों के हस्ताक्षर भी शामिल थे। लेकिन अब तक इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

विपक्ष का दावा है कि शिकायतों पर न तो कोई कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और न ही कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी गई। जबकि पहले के चुनावों में आयोग इस तरह के मामलों पर तुरंत कार्रवाई करता था।

दोहरे रवैये का आरोप

पत्र में यह भी आरोप लगाया गया है कि आयोग ने भाजपा की शिकायतों पर तेजी से कार्रवाई की, जबकि विपक्ष की शिकायतों को नजरअंदाज किया गया। इसे विपक्ष ने “दोहरे मानदंड” का उदाहरण बताया है।

राजनीतिक हलचल तेज

इस पूरे घटनाक्रम के बाद देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। विपक्ष इसे लोकतंत्र और चुनावी निष्पक्षता से जोड़कर देख रहा है, जबकि सरकार और आयोग की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

अब सबकी नजर राज्यसभा सभापति के अगले कदम और इस प्रस्ताव पर होने वाली संभावित कार्रवाई पर टिकी हुई है।

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