अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की जोड़ी एक बार फिर बड़े पर्दे पर लौट आई है, और इस बार उनकी फिल्म ‘भूत बंगला’ को लेकर दर्शकों में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। फिल्म में जहां एक तरफ जबरदस्त कॉमेडी और हॉरर का तड़का है, वहीं दूसरी ओर इसकी तुलना 2007 की कल्ट क्लासिक फिल्म ‘भूल भुलैया’ से भी की जा रही है। यही वजह है कि दर्शकों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या ‘भूत बंगला’ वाकई ‘भूल भुलैया’ जैसी ऐतिहासिक फिल्म को टक्कर दे पाती है या नहीं।
फिल्म देखने के बाद कई दर्शकों और समीक्षकों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर ‘भूत बंगला’ में ऐसी कौन-सी कमियां रह गईं, जो इसे एक क्लासिक बनने से रोक सकती हैं। शुरुआत में फिल्म काफी मजबूत नजर आती है और पहले 40-45 मिनट तक कॉमेडी का अच्छा अनुभव देती है, लेकिन इसके बाद कहानी की पकड़ कमजोर होती दिखती है। वहीं ‘भूल भुलैया’ की सबसे बड़ी ताकत उसकी सधी हुई कहानी और लगातार बना रहने वाला सस्पेंस था, जो दर्शकों को अंत तक बांधे रखता था।
‘भूत बंगला’ के निर्देशन को लेकर भी मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कहा जा रहा है कि जहां प्रियदर्शन की पिछली फिल्मों में कहानी का प्रवाह और दृढ़ निर्देशन देखने को मिलता था, वहीं इस बार फिल्म कई जगहों पर बिखरी हुई नजर आती है। कहानी एक स्पष्ट दिशा में आगे नहीं बढ़ पाती, जिससे दर्शकों को बीच-बीच में फिल्म धीमी लगने लगती है।
स्क्रीनप्ले की बात करें तो ‘भूल भुलैया’ का लेखन बेहद मजबूत और कसावट वाला माना जाता था, जबकि ‘भूत बंगला’ में कई जगहों पर कहानी कमजोर पड़ती नजर आती है। कई दृश्य जरूरत से ज्यादा खिंचे हुए लगते हैं और कुछ जगहों पर तार्किकता की कमी भी महसूस होती है। यही वजह है कि फिल्म अपने प्रभाव को पूरी तरह स्थापित नहीं कर पाती।
सबसे बड़ा अंतर दोनों फिल्मों के क्लाइमैक्स में भी देखा जा सकता है। ‘भूल भुलैया’ का क्लाइमैक्स एक मनोवैज्ञानिक रहस्य को उजागर करता है और दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देता है कि भूत जैसी कोई चीज नहीं होती। वहीं ‘भूत बंगला’ का क्लाइमैक्स भूत-प्रेत और तंत्र-मंत्र की दुनिया को वास्तविकता के रूप में प्रस्तुत करता है, जो हर दर्शक को समान रूप से प्रभावित नहीं कर पाता।
इसके अलावा, संगीत भी दोनों फिल्मों के बीच एक बड़ा फर्क पैदा करता है। ‘भूल भुलैया’ के गाने जैसे ‘मेरे ढोलना’, ‘हरे राम हरे कृष्णा’ और ‘लाबो को’ आज भी लोगों की यादों में बसे हुए हैं। इसके मुकाबले ‘भूत बंगला’ का संगीत उतना प्रभावशाली नहीं माना जा रहा है, हालांकि एक गाना ‘राम जी आकर भला करेंगे’ थोड़ा असर छोड़ता है।
कुल मिलाकर, ‘भूत बंगला’ एक मनोरंजक हॉरर-कॉमेडी फिल्म जरूर है, लेकिन इसे ‘भूल भुलैया’ जैसी कल्ट क्लासिक के स्तर तक पहुंचने के लिए अभी कई मोर्चों पर और मजबूत होने की जरूरत है। दर्शकों का मानना है कि फिल्म में कॉमेडी और स्टारकास्ट तो दमदार है, लेकिन कहानी, स्क्रीनप्ले और निर्देशन में मौजूद खामियां इसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनकर सामने आती हैं।

