16 Apr 2026, Thu

’13 साल की लड़की के साथ निकाह पूरी तरह जायज’, कोर्ट के फैसले से दहशत में पाकिस्तानी ईसाई

Pakistan Karachi Minor Marriage Case: 13 साल की ईसाई लड़की के निकाह पर अदालत के फैसले से विवाद, समुदाय में गुस्सा

पाकिस्तान के कराची में एक 13 वर्षीय ईसाई लड़की के कथित अपहरण और निकाह से जुड़े मामले में अदालत के फैसले के बाद बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इस फैसले के बाद ईसाई समुदाय में गहरी नाराजगी और दहशत का माहौल देखा जा रहा है।

मामला मारिया शाहबाज नाम की नाबालिग लड़की से जुड़ा है, जिसमें फेडरल कॉन्स्टीट्यूशनल कोर्ट (FCC) ने उसके कथित अपहरणकर्ता के साथ हुए निकाह को वैध करार दिया है। इस निर्णय के बाद स्थानीय स्तर पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं।

कराची में विरोध प्रदर्शन

फैसले के खिलाफ सैकड़ों लोग कराची के सेंट पैट्रिक कैथेड्रल में इकट्ठा हुए और जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन कराची कैथोलिक आर्चडायोसिस और कैथोलिक कमीशन फॉर जस्टिस एंड पीस के सहयोग से आयोजित किया गया।

प्रदर्शनकारियों ने “जबरन धर्म परिवर्तन बंद करो”, “ईसाई लड़कियों को न्याय दो” और “बाल विवाह अपराध है” जैसे नारे लिखे पोस्टर लेकर विरोध जताया। उनका कहना है कि इस तरह के फैसले अल्पसंख्यक समुदायों में डर और असुरक्षा बढ़ाते हैं।

नेताओं और चर्च का बयान

कराची के आर्चबिशप बेनी मारियो ट्रावस ने इस फैसले पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में लोगों का विरोध प्रदर्शन यह दिखाता है कि समुदाय इस फैसले से कितना आहत है।

उन्होंने कहा कि कमजोर और गरीब परिवार अक्सर शोषण का शिकार हो जाते हैं और ऐसे मामलों में कानूनी सुरक्षा को और मजबूत करने की जरूरत है। साथ ही उन्होंने मानवाधिकार संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों से इस फैसले की समीक्षा की मांग की है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया

कैथोलिक कमीशन फॉर जस्टिस एंड पीस के समन्वयक काशिफ एंथनी ने कहा कि यह मुद्दा सिर्फ एक समुदाय का नहीं बल्कि पूरे देश के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा से जुड़ा है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों और स्थानीय नेताओं ने भी इस फैसले की आलोचना की है। उनका कहना है कि नाबालिग लड़कियों की सुरक्षा के लिए सख्त कानून और बेहतर न्यायिक प्रणाली की आवश्यकता है।

बढ़ती चिंता

यह मामला एक बार फिर पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा और नाबालिगों के अधिकारों को लेकर बहस छेड़ रहा है। मानवाधिकार संगठनों ने भी इस तरह के मामलों में पारदर्शी जांच और सख्त कार्रवाई की मांग की है।

फिलहाल इस विवाद पर स्थानीय प्रशासन और न्यायिक प्रणाली की ओर से आगे कोई नई आधिकारिक टिप्पणी सामने नहीं आई है।

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