महिला आरक्षण को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। संसद के मौजूदा सत्र में इस मुद्दे पर चर्चा शुरू होने जा रही है, लेकिन इससे पहले ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखा टकराव देखने को मिल रहा है। सरकार जहां इसे 2029 से लागू करने की तैयारी में है, वहीं विपक्ष इसे सियासी रणनीति का हिस्सा बता रहा है।
जानकारी के मुताबिक, 16 और 17 अप्रैल को लोकसभा में महिला आरक्षण पर चर्चा होगी, जबकि 18 अप्रैल को राज्यसभा में इस पर बहस के बाद वोटिंग कराई जाएगी। इस महत्वपूर्ण विषय पर व्यापक चर्चा के लिए सरकार ने बजट सत्र को तीन दिनों तक बढ़ाया है।
इस बीच विपक्षी दलों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर विपक्षी गठबंधन INDI अलायंस की एक अहम बैठक बुलाई गई है, जिसमें महिला आरक्षण और उससे जुड़े राजनीतिक पहलुओं पर रणनीति तैयार की जा रही है। इस बैठक में राहुल गांधी, के.सी. वेणुगोपाल, शशि थरूर और अन्य वरिष्ठ नेता शामिल हुए।
विपक्ष का मुख्य आरोप है कि सरकार महिला आरक्षण को परिसीमन (डिलिमिटेशन) से जोड़कर 2029 के चुनावों में राजनीतिक लाभ उठाना चाहती है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि अगर महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देना ही उद्देश्य है, तो इसे मौजूदा 543 लोकसभा सीटों में ही लागू किया जा सकता है। सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करने की जरूरत क्यों है, इस पर सरकार को जवाब देना चाहिए।
कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों का यह भी मानना है कि सीटों की संख्या बढ़ने से दक्षिण भारतीय राज्यों को नुकसान हो सकता है, जबकि कुछ अन्य क्षेत्रों को इसका राजनीतिक लाभ मिल सकता है। इसी कारण विपक्ष इस प्रस्ताव का खुलकर विरोध कर रहा है।
इसके अलावा, सोनिया गांधी ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय रखते हुए कहा है कि महिला आरक्षण के भीतर ओबीसी वर्ग के लिए भी आरक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि सरकार का असली मकसद महिला सशक्तिकरण नहीं, बल्कि परिसीमन के जरिए राजनीतिक समीकरण बदलना है।
विपक्ष का यह भी कहना है कि महिला आरक्षण को लागू करने में देरी क्यों की जा रही है। अगर सरकार वास्तव में महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देना चाहती है, तो इसे तुरंत प्रभाव से लागू किया जाना चाहिए, न कि 2029 तक टाला जाए।
वहीं सरकार की ओर से अभी तक यह स्पष्ट किया गया है कि महिला आरक्षण को लागू करने से पहले परिसीमन की प्रक्रिया जरूरी है, ताकि सीटों का संतुलन और प्रतिनिधित्व सही तरीके से तय किया जा सके।
कुल मिलाकर, महिला आरक्षण का मुद्दा अब सिर्फ सामाजिक सुधार तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। आने वाले दिनों में संसद के दोनों सदनों में होने वाली बहस और वोटिंग से यह तय होगा कि यह ऐतिहासिक फैसला किस दिशा में आगे बढ़ेगा।

