27 Feb 2026, Fri

कैसे होती है तेलुगु और कोडागु शादी? दो अलग-अलग रीति-रिवाजों से एक हो रहे रश्मिका-विजय, दोनों में जमीन-आसमान का अंतर

दक्षिण भारतीय सिनेमा के चर्चित सितारे विजय देवरकोंडा और रश्मिका मंदाना की शादी इन दिनों चर्चा का केंद्र बनी हुई है। यह विवाह केवल दो कलाकारों का मिलन नहीं, बल्कि दो समृद्ध और अलग-अलग संस्कृतियों का अद्भुत संगम है। एक ओर विजय का पारंपरिक तेलुगु परिवार, तो दूसरी ओर रश्मिका का कर्नाटक के कुर्ग (कोडागु) क्षेत्र के ‘कोडवा’ समुदाय से संबंध—इन दोनों परंपराओं ने इस शादी को खास और ऐतिहासिक बना दिया है।

सुबह वैदिक रीति-रिवाजों के साथ तेलुगु विवाह

शादी की शुरुआत सुबह तेलुगु परंपरा के अनुसार वैदिक विधि-विधान से हुई। इस समारोह में ‘जीलाकारा-बेल्लम’ रस्म मुख्य आकर्षण रही, जिसमें दूल्हा-दुल्हन एक-दूसरे के सिर पर जीरा और गुड़ का पेस्ट लगाते हैं। यह प्रतीक है कि जैसे जीरा और गुड़ मिलकर एक नया स्वाद बनाते हैं, वैसे ही पति-पत्नी जीवन के हर सुख-दुख में एकाकार रहेंगे।

इसके बाद ‘तलमब्रालु’ की रस्म निभाई गई, जिसमें जोड़े ने एक-दूसरे पर हल्दी मिले चावल और मोती बरसाए। यह हंसी-खुशी और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। तेलुगु विवाह में अग्नि को साक्षी मानकर मंत्रोच्चार के साथ सात फेरे लिए जाते हैं। पूरा समारोह आध्यात्मिकता, वैदिक परंपरा और सात्विक भोजन की गरिमा से ओतप्रोत रहा।

शाम को कोडवा परंपरा का अनोखा रंग

शाम का समारोह पूरी तरह से कोडवा परंपरा पर आधारित रहा, जो उत्तर भारतीय या तेलुगु शादियों से बिल्कुल अलग है। कोडवा समुदाय की विशेषता यह है कि यहां विवाह के लिए पंडित या अग्नि के फेरों की आवश्यकता नहीं होती। यह एक सामाजिक और पारिवारिक संस्कार है, जिसमें बुजुर्गों का आशीर्वाद सर्वोपरि होता है।

शादी की थीम ‘प्राइमल’ रखी गई, जो विरासत और योद्धा संस्कृति को दर्शाती है। ‘बाले बिरुदु’ रस्म में दूल्हे ने पारंपरिक ‘पीचे कत्ती’ (तलवार) से केले के तने को एक वार में काटकर अपनी दक्षता और साहस का प्रदर्शन किया। इसके अलावा ‘गंगा पूजा’ के माध्यम से दुल्हन का नए परिवार में स्वागत किया गया, जो जल और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है।

परंपराओं का गहरा अंतर

तेलुगु और कोडवा विवाह के बीच सबसे बड़ा अंतर धार्मिक और सामाजिक संरचना का है। जहां तेलुगु विवाह पूरी तरह वैदिक और मंत्रोच्चार पर आधारित है, वहीं कोडवा विवाह प्रकृति, पूर्वजों और पारिवारिक मूल्यों पर केंद्रित है।

खान-पान में भी बड़ा अंतर देखने को मिला। तेलुगु शादी में पारंपरिक शाकाहारी भोजन केले के पत्तों पर परोसा गया, जबकि कोडवा परंपरा में मांसाहारी व्यंजन, विशेषकर ‘पंदी करी’, उत्सव का प्रमुख हिस्सा रहे।

परिधान और शस्त्र परंपरा

पहनावे में भी दोनों संस्कृतियों की झलक साफ दिखी। सुबह विजय ने पारंपरिक रेशमी धोती और अंगवस्त्र धारण किया, जबकि रश्मिका कांजीवरम साड़ी में नजर आईं। शाम को रश्मिका ने कोडवा शैली की साड़ी पहनी, जिसमें पल्लू पीछे की ओर होता है। विजय ने ‘कुप्पिया’ (लंबा काला कोट) और ‘चेले’ (कमरबंद) पहनकर योद्धा लुक अपनाया।

जहां तेलुगु शादी में मंगलसूत्र और बिछिया का महत्व होता है, वहीं कोडवा परंपरा में तलवार और शस्त्र पूजन विशेष स्थान रखते हैं।

विजय और रश्मिका की यह शादी न केवल प्रेम का उत्सव है, बल्कि भारतीय संस्कृति की विविधता, सादगी और विरासत का जीवंत उदाहरण भी है।

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