हल्द्वानी बनभूलपुरा मामला: रेलवे जमीन से अतिक्रमण हटेगा, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश
उत्तराखंड के हल्द्वानी के बनभूलपुरा इलाके में रेलवे की जमीन पर कथित अतिक्रमण के मामले में मंगलवार को Supreme Court of India ने अहम आदेश जारी किया। कोर्ट ने साफ कहा कि संबंधित भूमि रेलवे की है और उस पर से अतिक्रमण हटाया जाएगा। साथ ही, विस्थापित होने वाले पात्र परिवारों के पुनर्वास और अस्थायी सहायता को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए गए।
जमीन रेलवे की, उपयोग का अधिकार भी उसी का
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अपीलकर्ताओं को यह अधिकार नहीं है कि वे उसी स्थान पर पुनर्वास की मांग करें। यह जमीन रेलवे की संपत्ति है और उसका उपयोग किस तरह किया जाए, यह तय करने का अधिकार भी रेलवे को ही है। कोर्ट ने कहा कि प्रभावित परिवारों की पहचान की जाए और उनके पुनर्वास की प्रक्रिया पारदर्शी ढंग से पूरी की जाए।
केंद्र और राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि विस्थापित होने वाले पात्र परिवारों को छह महीने तक हर महीने 2,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी।
पीएम आवास योजना के तहत आवेदन का निर्देश
अदालत ने कहा कि जो परिवार आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) में आते हैं, वे Pradhan Mantri Awas Yojana के तहत आवेदन कर सकते हैं। कोर्ट ने निर्देश दिया कि नैनीताल जिला प्रशासन और हल्द्वानी के एसडीएम लॉजिस्टिक सपोर्ट दें ताकि पात्र लोग फॉर्म भर सकें।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ईद (19 मार्च) के बाद एक सप्ताह का विशेष कैंप लगाया जाए, जहां अधिकारी मौजूद रहकर लोगों को योजना की जानकारी दें और आवेदन प्रक्रिया पूरी कराएं। सामाजिक कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर योजना के बारे में जागरूक करने के निर्देश भी दिए गए।
अप्रैल में दोबारा सुनवाई
अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले की अगली सुनवाई अप्रैल में होगी। तब तक रेलवे जमीन से अतिक्रमण हटाने की कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह राहत उत्तराखंड में अन्य अवैध कब्जों पर लागू नहीं होगी।
रेलवे का पक्ष
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि हल्द्वानी उत्तराखंड का अंतिम रेलवे विस्तार बिंदु है, जिसके बाद पहाड़ी क्षेत्र शुरू हो जाता है। रेलवे को ट्रैक विस्तार के लिए जमीन की आवश्यकता है और नदी के कारण पहले से दिक्कतें आ रही हैं।
सरकार ने बताया कि कुछ जमीनें फ्रीहोल्ड हैं और जहां आवश्यक होगा, वहां राज्य और रेलवे मिलकर मुआवजा देंगे।
याचिकाकर्ताओं की दलील
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि इलाके में करीब 50,000 लोग रह रहे हैं और सभी को एक साथ वैकल्पिक आवास देना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि रेलवे ने स्पष्ट विस्तार योजना पेश नहीं की है और आसपास खाली जमीन उपलब्ध होने के बावजूद वर्तमान बस्ती को हटाने की बात की जा रही है।
इस पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि कब्जाधारी यह तय नहीं कर सकते कि रेलवे किस जमीन का उपयोग करे। हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि झुग्गियों में रहने वालों के प्रति पूरी संवेदनशीलता रखी जानी चाहिए और उन्हें बेहतर जीवन का अधिकार है।
मानवीय और कानूनी संतुलन
सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने एक ओर सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने की आवश्यकता को स्वीकार किया, वहीं दूसरी ओर प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और आर्थिक सहायता पर भी जोर दिया। अब सबकी निगाहें अप्रैल में होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं।

