‘मां का सम’ रिव्यू: दिल और दिमाग के बीच उलझी औसत वेब सीरीज, मोना सिंह ने संभाला मोर्चा
ओटीटी प्लेटफॉर्म Amazon Prime Video पर रिलीज हुई नई वेब सीरीज Maa Ka Sum एक दिलचस्प कॉन्सेप्ट के साथ दर्शकों के सामने आई है। यह सीरीज गणित और रिश्तों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती है, लेकिन अंततः यह एक जटिल समीकरण बनकर रह जाती है। निर्देशक Nicholas Kharkongor ने इस बार एक अनोखी कहानी पेश करने की कोशिश की है, मगर निष्पादन में कई कमियां नजर आती हैं।
कहानी दिल्ली के एक प्रतिभाशाली छात्र अगस्त्य (मिहिर आहूजा) के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसकी दुनिया पूरी तरह गणित, डेटा और लॉजिक से संचालित होती है। उसकी मां विनीता, जिसका किरदार Mona Singh ने निभाया है, एक सिंगल मदर है जो अपने बेटे के लिए अपनी निजी खुशियों का त्याग कर चुकी है। कहानी में मोड़ तब आता है जब अगस्त्य अपनी मां के अकेलेपन को समझते हुए उसके लिए एक “परफेक्ट पार्टनर” खोजने का जिम्मा अपने ऊपर ले लेता है—वह भी एल्गोरिदम और डेटिंग ऐप्स की मदद से।
शुरुआती एपिसोड्स में मां-बेटे की केमिस्ट्री और हल्की-फुल्की बातचीत दर्शकों को बांधे रखती है। लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, अगस्त्य का व्यवहार नियंत्रणकारी और असहज होता जाता है। वह अपनी मां की निजी जिंदगी को भी एक प्रोजेक्ट की तरह ट्रीट करने लगता है, जिससे कहानी का भावनात्मक पक्ष कमजोर पड़ जाता है।
अभिनय की बात करें तो मोना सिंह इस सीरीज की सबसे मजबूत कड़ी हैं। उन्होंने एक ऐसी महिला का किरदार बखूबी निभाया है जो एक मां होने के साथ-साथ अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। उनकी परफॉर्मेंस सीरीज को कई जगहों पर संभालती है और दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने की कोशिश करती है।
वहीं मिहिर आहूजा ने अपने किरदार में मेहनत तो की है, लेकिन उनकी भूमिका को जिस तरह लिखा गया है, वह कन्फ्यूजिंग लगता है। कभी वह मासूम लगता है तो कभी अत्यधिक नियंत्रक और अहंकारी। इस वजह से दर्शकों के लिए उनके किरदार से जुड़ पाना मुश्किल हो जाता है। सहायक कलाकारों में रणवीर बरार और अंगिरा धर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं, लेकिन उन्हें ज्यादा स्क्रीन स्पेस या गहराई नहीं मिल पाती।
निर्देशन और तकनीकी पक्ष में भी सीरीज कमजोर नजर आती है। Nicholas Kharkongor की पिछली फिल्म ‘Axone’ की तुलना में यहां वह धार नहीं दिखती। सिनेमैटोग्राफी औसत है और दिल्ली जैसे शहर को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत नहीं कर पाती। सबसे बड़ी समस्या इसकी लंबाई और धीमी गति है—आठ एपिसोड की यह सीरीज कई जगहों पर खिंची हुई लगती है।
सीरीज की एक और बड़ी खामी इसका जरूरत से ज्यादा गणितीय होना है। जहां गणित को एक सहायक टूल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता था, वहीं इसे कहानी का केंद्र बना दिया गया है। जटिल समीकरण और तकनीकी शब्दजाल दर्शकों को थका देते हैं और भावनात्मक जुड़ाव कम कर देते हैं।
कुल मिलाकर, ‘मां का सम’ एक अच्छे विचार के बावजूद कमजोर निष्पादन की शिकार है। मोना सिंह की दमदार एक्टिंग इसे संभालती जरूर है, लेकिन सीरीज दर्शकों के दिल को छूने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाती। 2/5 की रेटिंग के साथ यह एक ऐसी सीरीज है जिसे आप एक बार देख सकते हैं, लेकिन इससे ज्यादा उम्मीद करना निराश कर सकता है।

