बीते दिनों बॉलीवुड के सिंगिंग के बादशाह अरिजीत सिंह ने फिल्मी दुनिया से अनिश्चितकालीन संन्यास लेने का ऐलान किया। उनके इस बयान ने संगीत प्रेमियों और मीडिया में हलचल मचा दी। इससे पहले भी कई ऐसे कलाकार रहे हैं जिन्होंने फिल्मी संगीत से दूरी बनाई और अपने करियर को अलग दिशा दी। इसी कड़ी में सिंगर मैथिली ठाकुर का नाम भी लिया जा सकता है। मैथिली ने सोशल मीडिया और लाइव शोज़ के जरिए अपनी आवाज का जादू बिखेरा, लेकिन उन्होंने कभी भी फिल्मी संगीत में कदम नहीं रखा और बाद में विधायक भी बनीं।
हाल ही में इस पर चर्चा करते हुए बॉलीवुड के दिग्गज जावेद अख्तर ने अपने पुराने अनुभव साझा किए और कहा कि कुछ फिल्मों के गाने “क्रिएटिव दिवालियापन” के उदाहरण हैं। वहीं, ऑस्कर विजेता म्यूजिक कंपोजर एआर रहमान ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में कहा कि पिछले दशक में बॉलीवुड की रचनात्मकता पर “प्रॉफिट ड्रिविन” मानसिकता हावी हो गई है। इस बदलाव ने कई बड़े कलाकारों को प्रभावित किया है, जिससे उन्हें या तो किनारा करना पड़ा या नई दिशा अपनानी पड़ी।
बीते दस सालों में बॉलीवुड में कई हिट फिल्में आईं जिन्होंने संगीत के मामले में दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। इनमें आशिकी 2, ऐ दिल है मुश्किल, बाजीराव मस्तानी, गली बॉय, तमाशा, उड़ान, जिंदगी ना मिलेगी दोबारा जैसी फिल्में शामिल हैं। इन फिल्मों ने दर्शकों के दिलों में संगीत के प्रति दीवानगी कायम रखी। लेकिन वहीं, सोशल मीडिया, ओटीटी प्लेटफॉर्म और रैप कल्चर के तेजी से फैलने ने बॉलीवुड के मधुर और मेहनती गानों की प्राथमिकता बदल दी।
गली बॉय जैसी फिल्म ने रैप को लोकप्रियता दी और बादशाह, एमिवे बंटाई जैसे रैपर्स ने एक नई ऑडियंस तैयार की। इसका असर बॉलीवुड के पारंपरिक गानों पर पड़ा और अब फिल्में अक्सर प्रॉफिट-ड्रिवन स्टाइल में बनाई जाने लगीं। इस बदलाव के बीच प्रकाश राज जैसे दिग्गज कलाकारों ने भी कहा कि हिंदी सिनेमा अपनी जड़ें खो रहा है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि क्रिएटिविटी पूरी तरह से समाप्त हो गई है।
अरिजीत सिंह ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि वे पूरी तरह फिल्मी दुनिया से हट रहे नहीं हैं, बल्कि अब वे कंपोजिंग और नए प्रोजेक्ट्स की दुनिया को एक्सप्लोर करना चाहते हैं। इससे यह साफ है कि बॉलीवुड में रचनात्मकता अभी भी जीवित है, लेकिन कलाकार अब अपने करियर और संगीत की दिशा स्वयं चुन रहे हैं।
इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि क्या बॉलीवुड में कलाकारों और संगीत की स्वतंत्रता पर लगातार आर्थिक दबाव और प्रॉफिट-फोकस्ड मानसिकता हावी हो रही है। संगीत प्रेमियों और युवा सिंगर्स के लिए यह सोचने का मौका है कि फिल्मों के बिना भी कला और संगीत में सफलता और पहचान संभव है।

