मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच Australia ने Strait of Hormuz को लेकर बड़ा और संतुलित बयान दिया है। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री Anthony Albanese ने साफ तौर पर कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को सभी देशों के लिए खुला रहना चाहिए और इस क्षेत्र में नौवहन की स्वतंत्रता बनाए रखना बेहद जरूरी है।
मेलबर्न में दिए एक इंटरव्यू के दौरान अल्बनीज ने स्पष्ट किया कि United States ने इस जलडमरूमध्य की संभावित नाकेबंदी के लिए ऑस्ट्रेलिया से किसी प्रकार की सहायता नहीं मांगी है। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने यह फैसला एकतरफा तरीके से लिया है और ऑस्ट्रेलिया को इसमें शामिल होने के लिए नहीं कहा गया। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने Iran के साथ विफल वार्ता के बाद होर्मुज में नाकेबंदी लागू करने की घोषणा की है।
दरअसल, पाकिस्तान में हुई अमेरिका-ईरान वार्ता करीब 21 घंटे तक चली, लेकिन किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। इसके तुरंत बाद अमेरिका ने कड़ा रुख अपनाते हुए जलडमरूमध्य में सैन्य कार्रवाई और समुद्री नाकेबंदी की योजना का ऐलान किया। यह कदम क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा सकता है, क्योंकि Strait of Hormuz दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है।
प्रधानमंत्री अल्बनीज ने इस स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि ऑस्ट्रेलिया चाहता है कि बातचीत फिर से शुरू हो और इस संघर्ष का शांतिपूर्ण समाधान निकाला जाए। उन्होंने जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता बनाए रखना जरूरी है, ताकि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित न हो।
उन्होंने कहा, “हम चाहते हैं कि होर्मुज जलडमरूमध्य सभी के लिए खुला रहे। यह सिर्फ क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए भी जरूरी है।” उनका यह बयान ऑस्ट्रेलिया की उस विदेश नीति को दर्शाता है, जिसमें शांति, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय नियमों के पालन को प्राथमिकता दी जाती है।
इस बीच Iran ने भी किसी भी संभावित नाकेबंदी का कड़ा विरोध किया है और चेतावनी दी है कि ऐसे किसी भी कदम का जवाब दिया जाएगा। ईरान का कहना है कि वह इस रणनीतिक जलमार्ग पर अपनी संप्रभुता और नियंत्रण बनाए रखेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर Strait of Hormuz में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न होती है, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ेगा और कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है। इसका प्रभाव भारत समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा, जो तेल आयात पर निर्भर हैं।
फिलहाल, दुनिया की नजरें इस संवेदनशील क्षेत्र पर टिकी हैं। ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की अपील से यह साफ है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस संकट का समाधान युद्ध के बजाय बातचीत और कूटनीति के जरिए चाहता है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह तनाव किस दिशा में जाता है और क्या वैश्विक शक्तियां मिलकर इस संकट को टालने में सफल हो पाती हैं।

