‘मामला लीगल है 2’ रिव्यू: कोर्टरूम ड्रामा में हंसी कम, सिस्टम की कहानी ज्यादा
ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई Maamla Legal Hai Season 2 इस बार अपने पहले सीजन से थोड़ा अलग अंदाज में नजर आती है। जहां पहले सीजन ने अपनी सादगी, देसी हास्य और अनोखे केसों से दर्शकों को खूब हंसाया था, वहीं दूसरा सीजन ज्यादा गंभीर और सिस्टम-केंद्रित कहानी पेश करता है। हालांकि यह बदलाव दिलचस्प होने के बावजूद पूरी तरह प्रभावी नहीं बन पाता।
सीजन 2 की कहानी वहीं से आगे बढ़ती है, लेकिन एक बड़े बदलाव के साथ। दर्शकों के पसंदीदा किरदार वीडी त्यागी, जिसे Ravi Kishan ने निभाया है, अब वकील नहीं बल्कि पटपड़गंज कोर्ट के जिला जज बन चुके हैं। काले कोट से जज की कुर्सी तक का यह सफर कहानी का मुख्य आधार बनता है। सीरीज इस बदलाव के जरिए यह दिखाने की कोशिश करती है कि एक जुगाड़ू और चतुर वकील जब न्याय की कुर्सी पर बैठता है, तो उसे निष्पक्षता और निजी रिश्तों के बीच किस तरह संतुलन बनाना पड़ता है।
कहानी में दूसरी तरफ कोर्ट के वकीलों की दुनिया भी चलती रहती है। सुजाता दीदी (निधि बिष्ट) और मिंटू (अंजुम बत्रा) के बीच चैंबर को लेकर खींचतान जारी है, जबकि अनन्या श्रॉफ (नाएला ग्रेवाल) आदर्शवाद और जमीनी सच्चाई के बीच फंसी नजर आती हैं। इस बार शो में कई सामाजिक मुद्दों को भी शामिल किया गया है, जैसे वैवाहिक अधिकार, पुरुषों के खिलाफ कानून और समलैंगिक रिश्तों से जुड़े केस। हालांकि ये विषय महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इन्हें कहानी में प्रभावी ढंग से पिरोया नहीं गया, जिससे कथानक थोड़ा बिखरा हुआ लगता है।
अभिनय की बात करें तो Ravi Kishan एक बार फिर शो की जान साबित होते हैं। जज वीडी त्यागी के रूप में उनका प्रदर्शन संतुलित और प्रभावशाली है। उनकी बॉडी लैंग्वेज और संवाद अदायगी में एक परिपक्वता नजर आती है, जो उनके किरदार को मजबूती देती है। वे बिना ज्यादा बोले भी कई सीन में असर छोड़ते हैं।
निधि बिष्ट अपनी कॉमिक टाइमिंग से कुछ हल्के पल जरूर लेकर आती हैं, जबकि अंजुम बत्रा के साथ उनकी नोकझोंक मनोरंजन का काम करती है। नाएला ग्रेवाल ने अच्छा काम किया है, लेकिन इस बार उनके किरदार को ज्यादा विस्तार नहीं मिल पाया। नई एंट्री के तौर पर कुशा कपिला और दिव्येंदु भट्टाचार्य भी कहानी में जुड़ते हैं, लेकिन उन्हें पूरी तरह चमकने का मौका नहीं मिलता।
निर्देशन के स्तर पर Rahul Pandey ने पटपड़गंज कोर्ट के माहौल को यथार्थवादी ढंग से दिखाने की कोशिश की है। कोर्ट रूम, चैंबर और सरकारी दफ्तरों की अव्यवस्था को अच्छे से कैप्चर किया गया है। हालांकि, इस बार संपादन और पेसिंग बड़ी कमजोरी बनकर सामने आती है। कई एपिसोड जरूरत से ज्यादा लंबे लगते हैं और कुछ सीन बेवजह खिंचते नजर आते हैं।
सीरीज की सबसे बड़ी कमी इसका हास्य पक्ष है। जहां पहला सीजन अपनी तीखी जिरह और मजेदार केसों के लिए जाना गया था, वहीं इस बार वह धार गायब नजर आती है। मेकर्स ने गंभीर मुद्दों पर ज्यादा फोकस किया है, जिससे शो का मनोरंजन पक्ष कमजोर पड़ गया है।
कुल मिलाकर, ‘मामला लीगल है 2’ एक औसत सीक्वल है जो अपने पहले सीजन की ऊंचाइयों को छूने में नाकाम रहती है। यह पूरी तरह खराब नहीं है, लेकिन उतनी यादगार भी नहीं बन पाती। 2.5/5 की रेटिंग के साथ यह सीरीज उन दर्शकों के लिए ठीक है जो किरदारों से जुड़ाव रखते हैं, लेकिन अगर आप हंसी से भरपूर कोर्टरूम ड्रामा की उम्मीद कर रहे हैं, तो आपको थोड़ा निराशा हो सकती है।

